डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:  क्या हमारी रसोई को बिजली से चलाने का समय अब आ गया है?
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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम: क्या हमारी रसोई को बिजली से चलाने का समय अब आ गया है?

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भारत में रसोई को अकसर घर का दिल कहा जाता है। लेकिन इसके पीछे एक असहज सच भी छिपा है- हमारी रसोई अमूमन घर के सबसे प्रदूषित स्थानों में से एक होती है। आज जब पश्चिम एशिया के संघर्षों और तेल-गैस की अनिश्चित आपूर्ति के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर है, तब भारत को पुनर्विचार करना होगा कि वह कैसे खाना पकाता है। भारतीय रसोई को चरणबद्ध तरीके से बिजली आधारित बनाने की दिशा में दीर्घकालिक योजना पर अब गंभीरता से विचार आवश्यक है। दशकों से खाना पकाने से होने वाला इनडोर वायु प्रदूषण चुपचाप करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता आ रहा है। यह समस्या विशेष रूप से ग्रामीण भारत और गरीब शहरी परिवारों में अधिक गंभीर है। अध्ययनों से पता चला है कि बायोमास ईंधन से चलने वाली रसोई में प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक होता है। शहरी मध्यमवर्गीय घरों में भी स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, जहां घर के भीतर वायु गुणवत्ता कई बार बाहर की हवा से पांच से दस गुना खराब पाई गई है। भारतीय घरों में खराब हवा की दोहरी समस्या है- एक ओर ईंधन का प्रकार और दूसरी ओर खाना पकाने के तरीके। तेज आंच पर पकाना, तेल और मसालों से उठने वाला धुआं मिलकर इसे प्रदूषण का केंद्र बना देते हैं। शोध बताते हैं कि खाना पकाने से उत्पन्न प्रदूषण का संबंध दमा, फेफड़ों की क्रॉनिक बीमारी, हृदय रोग, मोतियाबिंद, त्वचा और आंखों की समस्याओं तथा समय से पहले मृत्यु से है। महिलाएं, जो रसोई में अधिक समय बिताती हैं, और छोटे बच्चे, जो अकसर मांओं के पास रहते हैं, इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। भारत ने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। एलपीजी के विस्तार से कई घरों में बायोमास पर निर्भरता कम हुई है। इससे महिलाओं को राहत मिली और धुएं में कमी आई। लेकिन एलपीजी अंतिम समाधान नहीं है। यह अभी भी जीवाश्म ईंधन है, जिसकी कीमत और उपलब्धता वैश्विक स्थितियों पर निर्भर करती है। ऐसे में बिजली आधारित रसोई एक अधिक टिकाऊ और भरोसेमंद विकल्प के रूप में सामने आती है। यह सही है कि अभी भारत सरकार और अधिकांश परिवार बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक कुकिंग के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं, लेकिन इस विचार को नीति और सार्वजनिक चर्चा में स्थान देना जरूरी है। किसी भी बड़े परिवर्तन को जमीन पर लागू होने में समय लगता है। आर्थिक दृष्टि से भी यह बदलाव सार्थक है। इलेक्ट्रिक कुकिंग एलपीजी की तुलना में अधिक एनर्जी-सैवी होती है और इसमें ऊर्जा का बड़ा हिस्सा सीधे बर्तन तक पहुंचता है। जैसे-जैसे भारत सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार कर रहा है, बिजली की लागत अधिक स्थिर और प्रतिस्पर्धी हो सकती है। यह ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों लक्ष्यों के अनुरूप है। हालांकि कई चुनौतियां भी हैं। देश के कई हिस्सों में बिजली की आपूर्ति अभी भी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है। केवल कनेक्शन होना पर्याप्त नहीं, निरंतर और पर्याप्त बिजली भी जरूरी है। इसके अलावा, इंडक्शन चूल्हे और अन्य उपकरणों की शुरुआती लागत गरीब परिवारों के लिए बाधा बन सकती हैै। भारतीय भोजन में तेज आंच, लंबे समय तक पकाना और बड़े बर्तनों का उपयोग शामिल होता है। कई लोगों को लगता है इलेक्ट्रिक चूल्हे पर वही स्वाद नहीं मिलेगा। इन धारणाओं को बदलने के लिए जागरूकता और भरोसा जरूरी है। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए स्पष्ट नीतिगत रोडमैप भी आवश्यक होगा। लक्षित सब्सिडी और आसान वित्तीय विकल्पों से गरीब परिवारों को मदद मिल सकती है। रूफटॉप सोलर जैसी व्यवस्था भी इलेक्ट्रिक कुकिंग को समर्थन दे सकती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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