एन. रघुरामन का कॉलम:  अधिकतर परिवारों के लिए फोन बेबीसिटर बन गए हैं
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एन. रघुरामन का कॉलम: अधिकतर परिवारों के लिए फोन बेबीसिटर बन गए हैं

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अगर आप ग्रामीण भारत में किसी पैसेंजर ट्रेन में सफर कर रहे हैं तो आपको कुछ ऐसा दृश्य दिख सकता है- चलती ट्रेन में भी किचन की जिम्मेदारी संभाल रही एक युवा मां अपने हैंडबैग में हाथ डालती है। उसका साल भर का बेटा राहुल (काल्पनिक नाम) बेचैन है। उसके नन्हे-से हाथ मां की कलाई की कांच की चूड़ियों पर पहुंच रहे हैं। मां अभ्यस्त तरीके से अपना स्मार्टफोन अनलॉक करती है, डांसिंग फ्रूट्स के हाई-कॉन्ट्रास्ट एनिमेशन खोलती है और फोन बेटे को दे देती है। वह धीरे से कहती है, ‘राहुल बैठे रहो, मम्मी को खाना बनाना है।’ वह लोअर बर्थों के बीच की छोटी-सी जगह पर जाती है, स्टेनलेस स्टील के डिब्बे खोलती है और स्नैक्स बनाने का मेहनत भरा काम शुरू करती है। कुछ कुरमुरे मिक्स करती है, धनिया पत्ती के साथ कुछ प्याज और हरी मिर्च काटती है, नींबू निचोड़ती है। इस पर नमक और लाल मिर्च छिड़क कर बातों में तल्लीन अपने पति और तीन बुजुर्ग रिश्तेदारों को परोसती है। अगले एक घंटे तक माहौल अविस्मरणीय तरीके से शांत रहता है। ट्रेन चले जा रही है। ट्रैक बदलते हुए झटके खाती है। रेल जॉइंट्स पर लयबद्ध तरीके से उछलती है, जिसका कंपन फर्श में महसूस होता है। कुछ बड़े बच्चे डिब्बे की खिड़की से बाहर गायों को देख रहे हैं या ऊपरी बर्थ पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन राहुल ‘आज्ञाकारी’ मूर्ति बना बैठा है। वह नीले रंग की फॉक्स-लेदर सीट पर पालथी मारकर बैठा है, रीढ़ प्रश्नचिन्ह की तरह झुकी है। उसकी गर्दन नीचे है और ठुड्डी लगभग छाती से चिपक गई है। खिड़की के बाहर सरसों के हरे खेत, लहराते पाम ट्रीज, स्टेशन वेंडर्स की ‘चाय-गरम’ की आवाजें जैसे भारतीय परिदृश्य के विविध रंगों और शोर-शराबे को वह देख तक नहीं पाता। उसकी आंखें जमी हुई हैं। स्क्रीन की ब्लू लाइट उसकी पुतलियों में रिफ्लेक्ट हो रही है, जो डिब्बे की गर्म और धुंधली रोशनी से बिल्कुल अलग है। हालांकि ट्रेन के मूवमेंट से उसका वेस्टिब्युलर सिस्टम (भीतरी कान की संतुलन और स्थान की समझ) सक्रिय होना चाहिए, लेकिन यह डिजिटल एकाग्रता उसकी शारीरिक हकीकत को ‘म्यूट’ कर देती है। उसके दिमाग एक बड़ा सेंसरी मिसमैच झेल रहा है- शरीर तो ट्रेन के झटके महसूस कर रहा है, लेकिन आंखें स्थिर और सपाट कार्टून जग​त देख रही हैं। रिश्तेदारों के लिए राहुल एक ‘ड्रीम चाइल्ड’ है। एक आंटी ने कहा, ‘देखो कितना शांत है, मां को बिल्कुल परेशान नहीं करता।’ हां, सतही तौर पर देखने वाले के लिए वह ‘वेल बिहेव’ बच्चा है, लेकिन किसी डेवलपमेंटल स्पेशलिस्ट के लिए वह अपने प्राकृतिक विकास में शांत अवरोध झेल रहा होता है। वे इस शांत अवरोध को नहीं देख पाते। वे यह नहीं समझ पाते कि उसकी ‘आज्ञाकारिता’ असल में न्यूरोलॉजिकल दबाव की स्थिति है। जब तक स्नैक्स परोसे जाएंगे और अंतत: फोन हटाया जाएगा, राहुल का दिमाग थक चुका होगा। ऐसा खोजबीन के कारण नहीं, बल्कि हजारों चमकती तस्वीरों को प्रोसेस करने के दबाव से होता है। जबकि चलती ट्रेन के बीच उसका शारीरिक विकास, जैसे चलने, संतुलन बनाने और बातचीत करने की जरूरत ठहर चुकी होती है। यह कहानी बताती है कि भारत में बच्चों को समय से पहले मोबाइल देना एक ‘खामोश अवरोधक’ है। यह बहुत जाहिराना तरीके से नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि खामोशी से दिमाग निर्मित करने वाले पलों को चुरा लेता है। एक साल के बच्चे के लिए तो गत्ते का डिब्बा ही स्पेसशिप, चम्मच एक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट और ग्रैंड पैरेंट्स की जेब में रखी हर चीज दुनिया को समझने का जरिया होती है। ग्रैंड पैरेंट्स का चेहरा ही उसकी पूरी दुनिया होती है। इनकी जगह जब हम उसके हाथ में पांच इंच की स्क्रीन थमा देते हैं तो कुछ मिनट की शांति के बदले पूरी जिंदगी की कॉग्निटिव और शारीरिक क्षमताओं का सौदा कर लेते हैं। क्लिनिकों में 1 से 5 साल के ऐसे बहुत बच्चे आ रहे हैं, जो कम बोलते हैं, आई कॉन्टैक्ट से बचते हैं और फोकस करने में परेशानी महसूस करते हैं। संभवत: यह जरूरत से अधिक स्क्रीन एक्सपोजर का असर हो। फंडा यह है कि अगर आपका 1 से 5 साल का बच्चा है तो उसकी दुनिया को पांच इंच की स्क्रीन तक सीमित मत करिए।



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