दिग्गज सीईओ दोबारा लिख रहे हैं कॉर्पोरेट जगत के नियम:  वन टू वन मीटिंग नहीं करते हुआंग; टहलकर रीसेट होते हैं खोंजेमा
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दिग्गज सीईओ दोबारा लिख रहे हैं कॉर्पोरेट जगत के नियम: वन टू वन मीटिंग नहीं करते हुआंग; टहलकर रीसेट होते हैं खोंजेमा

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आज के दौर में एक औसत ‘वाइट कॉलर’ कर्मचारी की जिंदगी लगातार ईमेल, अंतहीन मीटिंग्स और हफ्ते के अंत तक होने वाली मानसिक थकान के बीच सिमट कर रह गई है। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों को चलाने वाले दिग्गज इस थकान से कैसे बचते हैं? 2026 के इस दौर में 450 लाख करोड़ की वैल्यू वाली कंपनी चलाने वाले जेन्सेन हुआंग से लेकर एयरबीएनबी के ब्रायन चेस्की और इनकी तरह बाकी सीईओ कॉर्पोरेट जगत के पुराने नियम ताक पर रखकर सफलता की नई कहानी लिख रहे हैं। जानिए इनके अनूठे नियम… जरूरी जानकारी सबको पता होनी चाहिए दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल एनवीडिया सीईओ जेन्सेन हुआंग का मानना है कि अकेले में की जाने वाली मीटिंग्स वक्त की बर्बादी हैं। उनके 55 अधीनस्थ हैं, पर वे किसी के साथ भी अलग से मीटिंग नहीं करते। उनका तर्क है कि कोई जानकारी जरूरी है, तो वह पूरी टीम को एक साथ पता होनी चाहिए। इससे न सिर्फ पारदर्शिता बढ़ती है, बल्कि कंपनी में सूचनाओं का प्रवाह बिजली की गति से होता है, जो आज की एआई की रेस में सबसे जरूरी है। 10 से पहले मीटिंग नही एयरबीएनबी के प्रमुख ब्रायन चेस्की ईमेल के बजाय सिर्फ टेक्स्ट मैसेज और कॉल के जरिए काम करते हैं। सुबह जल्दी काम में जुटने के पुराने मिथक को भी उन्होंने तोड़ दिया है। वे सुबह 10 बजे से पहले कोई मीटिंग नहीं लेते। कहते हैं,‘जब आप सीईओ हैं, तो आप तय कर सकते हैं कि दिन की पहली मीटिंग कब होगी।’ नैप से सतर्कता यूनाइटेड एयरलाइंस के सीईओ स्कॉट किर्बी मानसिक सतर्कता का श्रेय ऑफिस में ली जाने वाली झपकी को देते हैं। वे करियर की शुरुआत में ऑफिस के फर्श पर ही सो जाते थे। बाद में स्टाफ ने सोफे का इंतजाम किया। किर्बी कहते हैं,‘20 मिनट सो लेता हूं, तो मैं उन 20 मिनटों में किए गए किसी भी काम से ज्यादा हासिल कर लेता हूं।’ हार्वर्ड की स्टडी भी कहती है- नैप दिमाग को 100% फैसले लेने की क्षमता देती है। 10 मिनट में मेंटल रीसेट क्लाउड कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म ट्विलियो के भारतीय मूल के सीईओ खोंजेमा शिपचंदलर कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए ‘स्मार्ट शेड्यूलिंग’ की मदद लेते हैं। वे मीटिंग्स के समय को 30 मिनट के बजाय 25 मिनट और एक घंटे के बजाय 50 मिनट पर ही सीमित कर देते हैं।इन बचे हुए 5-10 मिनट का इस्तेमाल टहलने और ‘मेंटल रीसेट’ के लिए करते हैं। खोंजेमा कहते हैं, बैक-टू-बैक मीटिंग्स से होने वाली थकान को दूर करने के लिए ताजी हवा लेना और शारीरिक सक्रियता दिमाग को अगले महत्वपूर्ण निर्णय के लिए फिर से ऊर्जावान बना देती है। रिएक्टिव नहीं क्रिएटिव बनें मनोवैज्ञानिक डॉ. एडम ग्रांट कहते हैं,‘अक्सर हम ‘व्यस्त’ रहने को ‘सफलता’ मान लेते हैं, असली लीडरशिप सिर्फ जवाब देने में नहीं बल्कि सोच-विचार के लिए वक्त निकालने में है। ये सीईओ मीटिंग्स व ईमेल से हटकर दिमाग को ‘रिएक्टिव’ के बजाय ‘क्रिएटिव’ बना रहे हैं।’



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