पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  लोग बदलते नहीं, बस छिपा हुआ स्वभाव प्रकट हो जाता है
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: लोग बदलते नहीं, बस छिपा हुआ स्वभाव प्रकट हो जाता है

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28 मिनट पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

प्रेम, पैसा और पद धीरे-धीरे जीवन में आएं तब तो बहुत अधिक तकलीफ नहीं होगी, लेकिन जब ये अचानक आते हैं तब उपद्रव हो जाता है। कहते हैं ये तीनों जीवन में आएं तो लोग बदल जाते हैं। लेकिन गहराई से देखें तो सच तो यह है कि हमारा जो मूल रूप होता है, जो छिपा हुआ स्वभाव होता है- वह ये तीन स्थितियां अचानक आने पर बाहर निकलकर आ जाता है।

हमारे दबे हुए व्यक्तित्व का विस्फोट हो जाता है। इसी बात को तुलसीदास जी ने काकभुशुंडि जी के मुंह से कहलाया- श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि, मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि। मद ने किसको टेढ़ा और प्रभुता ने किसको बहरा नहीं कर दिया?

ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी स्त्री के नेत्र बाण न लगे हों। दबे हुए काम, क्रोध और लोभ बाहर निकल ही आते हैं और मनुष्य का आचरण बदला-बदला-सा नजर आता है। तो जब कभी ऐसी स्थिति जीवन में आए, सबसे पहले अपने मूल स्वभाव पर काम करें। गड़बड़ है तो सुधार लें, और सुधरे हुए हैं तो संवार लें।

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