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हमेशा सामान्य रहने की कोशिश करें। जब समाज में आपकी प्रतिष्ठा और पहचान होती है तो और अधिक सामान्य बनने का प्रयास करें। जब कभी हमारा कहीं अपमान हो जाए तो उससे व्यथित होने की जगह उस परिस्थिति और व्यक्ति से सीखें कि ऐसा हुआ क्यों। बल्कि मन ही मन उस स्थिति का आभार व्यक्त करें कि उस अपमान ने हमें धैर्य सिखाया। इसका परिणाम है निरभिमानिता, जो भगवान को बहुत पसंद है। काकभुशुंडि जी ने गरुड़ जी से कहा था- सुनहु राम कर सहज सुभाऊ, जन अभिमान न राखहिं काऊ। राम जी का सहज स्वभाव सुनिए, वे भक्त में अभिमान नहीं रहने देते। यदि हम निरभिमानी होते हैं तो राम जी का काम ही कम कर रहे होते हैं। हम अपने-आप अभिमान दूर करें तो भगवान को राहत मिल जाएगी और प्रसन्नता भी। अपने काम से प्रेम करें और इसे भूल जाएं कि लोग हमें नोटिस करें। सहयोगियों से विनम्रता का व्यवहार करें। अनजाने लोगों से अपनापन बनाए रखें तो इससे अभिमान गिरता है और ईश्वर प्रसन्न होता है।
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