टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: जब भी संकल्प लें, सबसे पहले मन को नियंत्रित करें

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कुछ अभियानों की कोई फिनिशिंग लाइन नहीं होती। आपको दौड़ना भी पड़ेगा, वक्त आने पर छलांग भी लगानी पड़ेगी। अब आज छोटे-मोटे काम, सामान्य सफलताएं बहुत अर्थ नहीं रखतीं। नई पीढ़ी कुछ अनूठा करने में माहिर है। उनकी तैयारी में उत्साह और सक्रियता तो है, पर संकल्प-शक्ति की कमी है। और इसके बिना वे आधे रास्ते में थक जाते हैं। जब भी कोई संकल्प लें, ध्यान रखें कि संकल्प सात्विक होना चाहिए, वरना हिंसा में बदल सकता है। संयम के साथ संकल्प लें। लोग समझते हैं संकल्प मन में लिया जाता है। दरअसल संकल्प आत्मा, हृदय और मस्तिष्क का विषय है। मन तो उस संकल्प को तोड़ने का काम करता है। आपने संकल्प लिया कि प्रातःकाल उठेंगे, सैर करने जाएंगे। अलार्म लगाया। जिनके पास दो मोबाइल हैं, वो दो में लगाते हैं। और जब वह अलार्म बजता है तो कौन है, जो भीतर से हाथ निकालकर उसको बंद करके आपको समझाता है कि आज नहीं, कल से करेंगे? यह काम मन का है। तो जब भी संकल्प लें, पहले मन को नियंत्रित करें। लिया गया संकल्प शत-प्रतिशत सफल होगा।



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