टिपण्णी

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: बिना अपना मूल्यांकन किए प्रशंसा को भीतर ना उतारें

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अपनी प्रशंसा पर भी टोल टैक्स लगाइए। क्योंकि जब हमारी प्रशंसा होती है और हमने प्रशंसा को ऐसे ही आने दिया, तो वह अहंकार लेकर आएगी। यहीं से प्रशंसा महंगी पड़ जाती है। प्रशंसा दुर्गुण बन जाती है। जब हमारी लोकप्रियता बढ़ती है, लोग हमारी तारीफ करते हैं तो शब्द और संबोधन उससे भी बड़े हो जाते हैं। यहीं से दुर्गुण आता है। हम टोल टैक्स पर फास्टैग की व्यवस्था रखते हैं या नकद भुगतान करते हैं। ऐसे ही जब प्रशंसा जीवन में आए तो हम उसे रोकें और उससे कहें कि भुगतान करिए। अब प्रशंसा का भुगतान क्या है- स्व-मूल्यांकन। बिना अपना मूल्यांकन किए प्रशंसा को भीतर मत उतारना। इसका एक प्रयोग राजा दशरथ ने अपनी सभा में किया था। रामचरितमानस के अयोध्याकांड के आरंभ में जब दशरथजी की प्रशंसा हो रही थी भरी सभा में, तो उन्होंने दर्पण देखा था। दर्पण सार्वजनिक रूप से नहीं देखा जाता। लेकिन उन्होंने देखा और कहा कि जब मेरी जय-जयकार हुई तो दर्पण देखकर मैंने मूल्यांकन किया। हम भी प्रशंसा पर स्व-मूल्यांकन का टोल टैक्स जरूर लगाएं।



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