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‘मैं खुद को शांत, समझदार व सभ्य मानता हूं। सुपरमार्केट में मेरी ट्रॉली किसी का रास्ता नहीं रोकती, सड़क पर कोई कितना भी दुर्व्यवहार करे, मैं मुस्करा देता हूं। पर घर पहुंचते ही अपनी पार्किंग स्पेस में किसी और की कार देखते ही सारी समझदारी हवा हो जाती है…।’ हार्वर्ड नेगोशिएशन एंड मीडिएशन क्लिनिकल प्रोग्राम के डायरेक्टर रह चुके बॉब बोर्डेने कहते हैं,‘उस वक्त मैं गुस्सैल बन जाता हूं, सीधे क्रेन वाले को फोन लगाता हूं- यह जानते हुए भी कि कार छुड़ाने में उस व्यक्ति को जुर्माना भरना पड़ेगा।’ मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यह गुस्सा सिर्फ पॉर्किंग को लेकर नहीं होता। दरअसल घर हमारी पहचान होता है। कोई हमारे इस सुरक्षित दायरे में घुसपैठ करता है तो हम धैर्य खो बैठते हैं। अपने ‘इलाके’ को बचाने के लिए आक्रामक हो जाते हैं।’ बोर्डेने के अनुसार इन दिनों यह समस्या और गंभीर हो गई है। समाज में आपसी भरोसा लगातार घटा है। राजनीतिक व सामाजिक मतभेदों ने अदृश्य दूरियां पैदा कर दी हैं। नतीजतन, ‘पड़ोसी धर्म’ का अर्थ भी बदला है- जो पहले हर चीज आपस में बांटना हुआ करता था, अब ‘एक-दूसरे के मामलों में दखल न देना’ बन गया है। बोर्डेने कहते हैं, ‘हाल ही में मेरी 73 वर्षीय मां मुझसे मिलने आई थीं। उन्होंने अनजाने में उसी पड़ोसी की रिजर्व्ड पार्किंग पर कार रख दी थी, जिससे मेरी बनती नहीं थी। मुझे लगा कि तमाशा होगा। पर, मेरी आशंका गलत साबित हुई। पड़ोसी ने मां की उम्र और स्थिति को समझते हुए मुस्कुराकर बात खत्म कर दी। उस घटना ने सिखाया कि सोशल मीडिया पर किसी को ब्लॉक करना आसान है, लेकिन वास्तविक जीवन में सहानुभूति, संवाद व समझदारी ही रिश्ते बेहतर बनाती है। कई बार एक गहरी सांस और थोड़ा धैर्य बड़े विवाद टाल सकते हैं।’ संवाद का माहौल बनाएं, दूसरों की परिस्थितियां समझें कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट एक्सपर्ट डॉ. जोनाथन स्मिथ कहते हैं, ‘कोई बात गलत लगे तो आरोप लगाने के बजाय समझदारी से बातचीत करें। जैसे देर रात वैक्यूम की आवाज आती है… क्या सब ठीक है?’ हो सकता है दंपती को सफाई का वक्त तभी मिलता हो। इससे संवाद का माहौल बनता है और उनकी परिस्थिति समझने का मौका मिलता है। तुरंत प्रतिक्रिया न दें, ताकि शांत निर्णय ले सकें। डॉ. स्मिथ कहते हैं,‘अच्छे पड़ोसी जीवन सुरक्षित, सरल व तनावमुक्त बनाते हैं। उनसे अच्छे रिश्ते मानसिक शांति देते हैं, आपात स्थिति में मदद मिलती है व रोजमर्रा के काम आसान हो जाते हैं।’
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