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15 घंटे पहले
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सवाल- मैं नई दिल्ली से हूं। मेरा 6 साल का बेटा पटाखों से बहुत डरता है। जब आसपास दूसरे बच्चे पटाखे जलाते हैं, तो वह घबराकर वहां से भाग जाता है या मेरे पीछे छिप जाता है। हमें उसके डर से कोई परेशानी नहीं है, बल्कि पटाखों से दूर रहना उसकी सुरक्षा के लिहाज से अच्छा ही है।
लेकिन दूसरे बच्चे उसे ‘डरपोक’ और ‘कमजोर’ कहकर चिढ़ाते हैं। इससे उसे शर्मिंदगी महसूस होने लगी है। सोचता है कि वह बाकी लड़कों की तरह बहादुर नहीं है। मैं उसे कैसे समझाऊं कि डरना सामान्य है। डरने का मतलब कमजोर होना नहीं है? दूसरे बच्चों के ताने सुनकर उसके मन में पैदा हो रही हीनभावना को कैसे दूर करूं, उसका आत्मविश्वास कैसे बढ़ाऊं?
एक्सपर्ट- रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई
जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। बच्चे का पटाखों से डरना बिल्कुल सामान्य है। ऐसे में उसे यह महसूस कराना जरूरी है कि डर लगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा को लेकर स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
दरअसल, 6 साल की उम्र में बच्चों का भावनात्मक विकास हो रहा होता है। वे आसपास के लोगों के व्यवहार और प्रतिक्रियाओं से अपने बारे में राय बनाने लगते हैं। ऐसे में जब दूसरे बच्चे किसी डर को लेकर चिढ़ाते हैं, तो बच्चा अपनी भावनाओं को ‘कमजोरी’ समझने लगता है। उसे लग सकता है कि अगर वह दूसरों की तरह पटाखे नहीं जला सकता, तो उसमें कोई कमी है।
धीरे-धीरे यह सोच उसके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती है। इससे उसके मन में अपने बारे में नकारात्मक धारणा बन सकती है। यहां माता-पिता के सामने दो चुनौतियां हैं।
- पहली, बच्चे के स्वाभाविक डर को समझना और उसे सुरक्षित महसूस कराना।
- दूसरी, दूसरे बच्चों की बातों से पैदा हो रही शर्मिंदगी और हीनभावना को दूर करना।
पटाखों से डरना कोई कमजोरी नहीं
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पटाखों से डरना कोई कमजोरी या बीमारी नहीं है। पटाखों की तेज आवाज, अचानक होने वाला धमाका, तेज रोशनी और धुएं से छोटे बच्चे का घबराना स्वाभाविक है। हर बच्चे की संवेदनशीलता अलग होती है। कुछ तेज आवाजों को आसानी से सहन कर लेते हैं, जबकि कुछ बच्चों को ऐसी आवाजों से परेशानी होती है।
इसलिए पेरेंट्स को बच्चे का डर खत्म करने की बजाय उसे समझने, उसकी भावनाओं को स्वीकार करने और धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए बच्चे को कुछ बातें सिखाना जरूरी है-

बच्चे के डर को समझें और स्वीकार करें
बच्चा पटाखों की आवाज सुनकर छिपता है या वहां से भागता है तो उसकी पहली जरूरत सेफ्टी और इमोशनल सपोर्ट की है। उस समय उसे यह समझाने की कोशिश न करें कि पटाखों से डरने की कोई जरूरत नहीं है। बच्चे को भले ही कोई तत्काल खतरा न हो। लेकिन उसके लिए वह आवाज वास्तव में डरावनी हो सकती है। ऐसे समय में उससे कहें-
”मैं समझ सकता हूं कि पटाखों की आवाज तुम्हें डराती है। तुम मेरे पास सुरक्षित हो। तुम्हें पटाखे जलाने या उनके पास जाने की जरूरत नहीं है।”
इससे बच्चे को पता चलता है कि उसकी भावनाओं को गंभीरता से लिया जा रहा है। इससे बच्चा अपनी भावनाओं को समझना और उन्हें मैनेज करना सीखता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में उसे असहाय मान लिया जाए।

बच्चे को बताएं ‘बहादुरी’ की परिभाषा
- 6 साल का बच्चा अक्सर बहादुरी का मतलब दूसरों की तरह व्यवहार करना समझता है।
- अगर आसपास के बच्चे पटाखे जला रहे हैं, तो उसे लग सकता है कि वह भी ऐसा नहीं करेगा तो कमजोर कहलाएगा।
- ऐसे में माता-पिता उसे समझा सकते हैं कि हर व्यक्ति की पसंद और सहजता अलग होती है।
- कोई बच्चा तेज आवाज से डरता है, कोई ऊंचाई से डरता है और किसी को अंधेरे में असहज महसूस होता है। इनमें से कोई भी बात किसी को कमजोर नहीं बनाती।
- बच्चे को यह भी बताएं कि बहादुरी का मतलब खतरे को नजरअंदाज करना नहीं है।
बच्चे को ‘बहादुरी’ की परिभाषा ऐसे समझा सकते हैं-

दोस्त चिढ़ाएं तो बच्चा क्या करे?
इस मामले में सिर्फ बच्चे का डर ही समस्या नहीं है। दूसरे बच्चों के तानों से वह अपने बारे में गलत धारणा बनाने लगा है। इसलिए पेरेंट्स उसे कुछ आसान जवाब सिखा सकते हैं, जिनका इस्तेमाल वह अपनी उम्र के बच्चों के बीच कर सके, जैसेकि-
- ‘’मुझे पटाखे जलाना पसंद नहीं है।‘’
- ‘’मुझे ऐसे चिढ़ाना बंद करो।‘’
- ‘’मुझे तुम्हारे साथ नहीं खेलना।‘’
- ‘’मैं मम्मी-पापा को बता दूंगा।‘’
इन जवाबों का अभ्यास घर पर खेल-खेल में करें। माता-पिता दूसरे बच्चे की भूमिका निभाएं और बच्चे को अपनी बात कहने का मौका दें। इससे उसे वास्तविक परिस्थिति में जवाब देने का भरोसा मिलेगा।
यह भी समझाएं कि अगर दूसरे बच्चे बार-बार उसे चिढ़ाते हैं, डराते हैं या पटाखे जलाने के लिए मजबूर करते हैं, तो वह वहां से हट सकता है और किसी बड़े को बता सकता है। हर ताने का जवाब देना जरूरी नहीं है।
ऐसे बढ़ाएं बच्चे का आत्मविश्वास
बच्चे में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उसकी उन खूबियों पर ध्यान दें, जिनका पटाखों से कोई संबंध नहीं है, जैसेकि-
- वह किसी की मदद करता है।
- दूसरे बच्चों से खिलौने साझा करता है।
- नई चीजें सीखने की कोशिश करता है।
- चित्र बनाता है।
- मुश्किल काम पूरा करने में मेहनत करता है।
इन खूबियों की तारीफ करते समय सामान्य शब्दों की बजाय स्पष्ट बात कहें। उदाहरण के लिए-
- ‘तुमने आज अपने दोस्त को खिलौना दिया।’
- ‘तुमने मुश्किल पहेली को दोबारा कोशिश करके पूरा किया। यह तुम्हें दूसरे बच्चों से अलग बनाता है।’
एक और जरूरी बात है कि बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से न करें। ये बातें बिल्कुल न कहें-
- ”देखो, तुम्हारा दोस्त कितना बहादुर है।”
- ”तुम्हें भी उससे सीखना चाहिए।”
- ”पटाखों से क्यों डरते हो, इसमें डरने जैसा कुछ नहीं है।”
ऐसे वाक्य उसमें हीनभावना बढ़ा सकते हैं। बच्चे को आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें-

पेरेंट्स इन गलतियों से बचें
कुछ पेरेंट्स सोचते हैं कि बच्चा बार-बार पटाखों की आवाज सुनेगा तो उसका डर अपने आप खत्म हो जाएगा।
लेकिन उसे जबरदस्ती पटाखों के पास ले जाना उलटा असर डाल सकता है।
इससे उसका डर बढ़ सकता है और माता-पिता पर भरोसा भी कम हो सकता है।

कब एक्सपर्ट की मदद लें?
पटाखों से डरना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। लेकिन इन स्थितियों में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर है-
- डर बच्चे पर हावी हो जाए।
- रोजमर्रा की तेज आवाजों से भी घबराहट हो।
- नींद या डेली रूटीन प्रभावित होने लगें।
- बच्चा खुद को कमजोर समझने लगे।
- दूसरे बच्चों के तानों के कारण इमोशनली परेशान हो।
अंतिम बात
बच्चे को यह सिखाना जरूरी है कि अपनी असहजता पहचानना, जरूरत पड़ने पर मना करना और सुरक्षित विकल्प चुनना भी बहादुरी है। पेरेंट्स का सहयोग और प्रोत्साहन उसे दूसरों की बातों से प्रभावित हुए बिना खुद पर भरोसा करना सिखाएगा।
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ग्राफिक- विपुल शर्मा
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