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आपने कभी गौर किया है कि चुनाव के दौरान या किसी बड़े राजनीतिक विवाद के वक्त, एक ही तरह का दावा आपके सोशल मीडिया फीड, ग्रुप व टीवी डिबेट्स में हर तरफ से घेर लेता है? अक्सर हमें लगता है कि ये नेता ऐसी बेतुकी बातें क्यों कर रहे हैं जिन्हें कोई भी समझदार व्यक्ति नकार देगा। पर सच्चाई यह है कि यह कोई इत्तेफाक या मूर्खता नहीं, बल्कि एक बहुत ही गहरी और सोची-समझी मनोवैज्ञानिक चाल है। अब तो विज्ञान ने भी यह साबित कर दिया है कि जब झूठ को आत्मविश्वास के साथ बार-बार दोहराया जाता है, तो वह धीरे-धीरे हमारे दिमाग में ‘सच्चाई’ की जगह लेने लगता है। इस मानसिक घटना को वैज्ञानिक आभासी सत्य या ‘इल्युसरी ट्रुथ इफेक्ट’ कहते हैं। जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सारा बारबर के शोध के अनुसार, किसी दावे की सच्चाई पर विश्वास करने की सबसे बड़ी छलांग तब लगती है जब हम उसे दूसरी बार सुनते हैं। इसके बाद हर अगला दोहराव उस दावे की साख को बढ़ाता जाता है। वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी की लिसा फाजियो की स्टडी बताती है कि यह असर साजिशी धारणाओं पर भी उतना ही होता है, जितना सामान्य जानकारी पर। इसमें यह भी सामने आया कि न तो किसी व्यक्ति का ‘साजिशी सोच’ के प्रति खुलापन, और न ही दावे की सच्चाई पर ज्यादा सोच-विचार करना, इस असर को घटाता है। दिलचस्प यह है कि यह प्रभाव उन लोगों पर भी उतना ही असर करता है जो खुद को बहुत समझदार व जागरूक मानते हैं। शोधकर्ता शौना बोवेस कहती हैं कि चाहे आप कितने भी तर्कशील क्यों न हों, बार-बार सुनी गई बात दिमाग में जगह बना ही लेती है। यह बिल्कुल वैसा ही मिथक है जैसे ‘इंसान अपने दिमाग का सिर्फ 10% इस्तेमाल करता है’। आज करोड़ों लोग इसे सच मानते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने इसे हर जगह सुना है, जबकि विज्ञान इस बात को पूरी तरह नकार चुका है। राजनेता भी इसी रणनीति पर चलते हैं; वे जनता के सामने काल्पनिक दुश्मन या झूठी उपलब्धि का ऐसा शोर पैदा करते हैं कि असली मुद्दे उस गूंज में दब जाते हैं। सूचना तंत्र को फिल्टर करने में ही असली सुरक्षा – एक्सपर्ट विज्ञान कहता है कि सिर्फ यह जानना कि ‘झूठ बार-बार बोलने से सच लगता है’, आपको इससे बचाने के लिए काफी नहीं है। सारा कहती हैं,‘असली सुरक्षा हमारे ‘सूचना तंत्र’ को फिल्टर करने में है। हमें उन स्रोतों के प्रति सावधान रहना होगा जो सिर्फ एक ही राग अलापते हैं। याद रखें, शोर की ताकत सच्चाई की ताकत नहीं होती। अगली बार जब आप किसी नेता को एक ही बात बार-बार दोहराते हुए देखें, तो समझ जाइए कि वह आपके तर्क को नहीं, बल्कि आपके दिमाग की ‘पहचानने की क्षमता’ को निशाना बना रहा है।’
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