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नौकरी का इंटरव्यू हो, स्टेज पर कोई बड़ा प्रेजेंटेशन या फिर जिंदगी का कोई मुश्किल इम्तिहान- ऐन वक्त पर दिल की धड़कनें तेज होना और हाथ-पैर कांपना आम बात है। ऐसे सामाजिक और मानसिक दबाव के क्षणों में अमूमन हमारे भीतर एक संवाद चलता है- ‘क्या ‘मैं’ यह कर पाऊंगा?’, ‘अगर ‘मुझसे’ गलती हो गई तो क्या होगा?’ मनोविज्ञान की नई रिसर्च कहती है कि संकट के इन पलों में ‘मैं’ या ‘मुझे’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल आपके तनाव को कई गुना बढ़ा देता है। इसके विपरीत, अगर आप खुद से बात करते समय अपना ही नाम लें या खुद को ‘तुम’ (थर्ड-पर्सन) कहकर बात करें, तो आपका दिमाग जादुई तरीके से शांत हो जाता है और प्रदर्शन निखरता है। ये खुद से बात करना है। अमेरिका में इस संबंध में किए गए 7 अलग-अलग स्टडी में पाया गया कि जब लोग सामाजिक दबाव के वक्त खुद से ‘तीसरे व्यक्ति’ के रूप में बात करते हैं, तो प्रदर्शन बेहतर होता है। तनाव घटता है। बाद में बार-बार गलती सोचने की आदत भी कम होती है। जर्नल ऑफ पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी की रिपोर्ट के अनुसार, खुद से अपना नाम लेकर बात करना प्रदर्शन सुधारने वाला सबसे भरोसेमंद टूल है। कैसे काम करती है यह तरकीब जब हम किसी उलझन में खुद का नाम जैसे- ‘अनिल तुम यह कर सकते हो’ कहते हैं तो हमारा दिमाग उस परिस्थिति से मनोवैज्ञानिक दूरी बना लेता है। मिशिगन यूनिवर्सिटी के भावना और आत्म-नियंत्रण लैब के शोध बताते हैं कि ऐसा करने पर दिमाग खुद को पीड़ित या घबराए व्यक्ति के रूप में देखना बंद कर देता है। वह खुद का ‘सलाहकार’ या गाइड बन जाता है, जिससे भावनाओं को नियंत्रित करना, सही फैसले लेना आसान हो जाता है। मनोवैज्ञानिक व थेरेपिस्ट डॉ. रूही सतीजा कहती हैं, ‘नाम लेकर स्वयं से बात करना दरअसल खुद को एक निष्पक्ष दोस्त की तरह बेहतरीन सलाह देने की मानसिक थेरेपी है।’ चिंता पर लगाम, गलतियों के डर से मुक्ति मिलती है इंटरव्यू रूम में जाने से पहले खुद से कहें, ‘तुमने तैयारी की है, तुम अच्छा करोगे।’ यह घबराहट को तुरंत कम करता है। जब आप खुद को तीसरे व्यक्ति की तरह देखते हैं, तो आप खुद को जज करना बंद कर देते हैं। इससे फोकस गलती के डर पर नहीं, बल्कि काम या लक्ष्य पर होता है। अमूमन किसी घटना के बाद लोग सोचते रहते हैं कि ‘मैंने’ ऐसा क्यों कहा। नाम लेकर सोचने से दिमाग उस वाकये को जल्दी भूलकर आगे बढ़ने में मदद करता है।
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