मेघना पंत का कॉलम:  क्या शहरी व सम्पन्न महिलाएं ही फेमिनिज्म की आवाज हैं?
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मेघना पंत का कॉलम: क्या शहरी व सम्पन्न महिलाएं ही फेमिनिज्म की आवाज हैं?

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इंस्टाग्राम पर कुछ समय पहले पूजा (पुजारिनी प्रधान) का मामला छाया हुआ था। वे पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र की एक कंटेंट क्रिएटर हैं, जो गांव का जीवन और किताबों, फेमिनिज्म, समाज आदि पर कंटेंट बनाती हैं। उनकी लोकप्रियता जब तेजी से बढ़ी तो उनके कंटेंट की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए गए और कहा गया कि इतने अच्छे वीडियो गांव की लड़की अकेले नहीं बना सकती, शायद उसके पीछे कोई एजेंसी या ब्रांड-सपोर्ट है। धीरे-धीरे यह सिलेक्टिव फेमिनिज्म बनाम वास्तविक एम्पॉवरमेंट की बहस बन गई। पूजा के पक्ष में कहा जाने लगा कि क्या गांव की महिला अच्छी अंग्रेजी नहीं बोल सकती और क्या यह सिर्फ शहरी महिलाओं का ही विशेषाधिकार है? इस पूरे प्रसंग से एक बात बहुत दु:खद ढंग से साफ होती है कि ‘टॉक्सिक फेमिनिज्म’ भी ‘टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी’ जितना ही बुरा है, बल्कि शायद उससे भी ज्यादा। बराबरी की लड़ाई में कहीं न कहीं हम दिखावे को ही मूल्य समझने की गलती कर बैठे हैं। कहीं-कहीं तो हम नारीवाद के असल मायनों से बहुत परे चले जाते हैं। हमने स्त्रीत्व के ऐसे रूप को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, जिसमें शोर तो बहुत है, लेकिन जो भीतर से खोखला है। जिसमें बगावत तो है, पर आत्मपरीक्षण नहीं। सच कहूं तो नाटकीयता, समझदारी से ज्यादा तेजी से फैलती है। मूर्खता जल्दी ध्यान खींचती है। और एल्गोरिदम्स को तो आक्रोश ही पसंद है। लेकिन एक असहज कर देने वाला सवाल देश को खुद से ही पूछना चाहिए कि क्या गांवों से शहरों तक सिर्फ वही महिलाएं भारतीय नारीवाद की आवाज बनेंगी, जो साधन-सम्पन्न और सलीके से संजी-संवरी हों? क्योंकि सच्चाई यही है कि ज्यादातर भारतीय महिलाएं इंस्टाग्राम की दुनिया में नहीं जीतीं। दहेज के लिए हर घंटे उनकी हत्या और हर 13 मिनट में उनके साथ दुष्कर्म होता है। 20 करोड़ महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हैं। वे ऐसे घरों में रहती हैं, जहां आज भी उन्हें पढ़ाई के लिए जूझना पड़ता है। दफ्तरों में समान वेतन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। और विवाह-संस्था में तो रोज वे आजादी की लड़ाई लड़ती हैं। उनके लिए नारीवाद दिखावे की चीज नहीं, अपने अस्तित्व की जंग है। फिर भी, आज भारतीय स्त्री की नुमाइंदगी करने वाली सबसे बुलंद आवाजें अकसर समाज के छोटे से तबके से आती है, जो शहरी, अंग्रेजीदां, डिजिटल दुनिया की जानकार और ‘एल्गोरिदम-अप्रूव्ड’ हैं। यह पूरी तरह गलत भी नहीं है। प्रतिनिधित्व बदलता रहता है। लेकिन यह प्रतिनिधित्व जब टॉक्सिक व्यवहार को तवज्जो दे, जब महिलाएं एक-दूसरे को नीचा दिखाकर खुश हों, तो हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है। नारीवाद कभी भी तमाशा बनने के लिए नहीं था। न इसका मकसद महज ऐसी नूराकुश्ती बन जाना था, जहां यह साबित करने की होड़ हो कि कौन किसे महज 30 सेकंड में हरा सकता है। जो हम देख रहे हैं, वह प्रगति नहीं, एक दिखावा है। उससे भी बदतर ये कि यह दिखावा उन्हीं व्यवस्थाओं को मजबूत करता है, जिन्हें नारीवाद खत्म करना चाहता है। पुरुषवादी इसे देखकर हंसते हैं। वे इसे और फैलाते हैं, क्योंकि पितृसत्ता के लिए इससे बेहतर और कुछ नहीं कि महिलाएं सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करें। यह सही है कि भारतीय नारीवाद में हर तरह की आवाजों के लिए जगह है, भले वह गुस्से से भरी, बेबाक, उलझी-सी या सधी हुई हो। नारीवाद को सही होने के लिए ‘अच्छा’ होना जरूरी नहीं, लेकिन जिम्मेदार होना आवश्यक है। उसे बड़ी लड़ाई का एहसास होना चाहिए। और वह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। जब सार्वजनिक विमर्श में नारीवाद के नाम पर छोटी-छोटी ऑनलाइन लड़ाइयां हावी हो जाएं तो इसके मायने क्या निकाले जाएं? इसका सबसे खतरनाक अर्थ यह है कि हम नारीवाद की व्यापकता को एक ब्रांड तक सीमित कर रहे हैं। ऐसा ब्रांड, जो हकीकत से ज्यादा वायरल होने की क्षमता पर टिका है। यह महिलाओं से अपने मुंह सिल लेने का आह्वान कतई नहीं, बल्कि सूझ-बूझ और गहराई दिखाने की अपील है। यह याद दिलाने की कोशिश है कि मकसद सिर्फ इतना भर नहीं था कि हमें सुना जाए, बल्कि यह था कि हमें उस बात के लिए सुना जाए- जो बदलाव ला सके। फेमिनिज्म को शायद अब खुद से ठहरकर पूछना चाहिए कि क्या हम एक आंदोलन बना रहे हैं, या ​महज कंटेंट क्रिएट कर रहे हैं? भारतीय नारीवाद को अपनी जिम्मेदारियों और बड़ी लड़ाइयों का एहसास होना जरूरी है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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