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2014 में तरुण तेजपाल यौन उत्पीड़न मामले के दौरान प्रकाशित एक लेख में उलटे पीड़िता पर ही लांछन लगाने के लिए “बबलगम फेमिनिज्म’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था। वह वाक्य मेरे जेहन में रह गया। इसलिए नहीं कि उसमें कोई खास चतुराई थी। बल्कि इसलिए कि इसमें एक खास किस्म की विडम्बना थी- यह कि बुद्धिजीवियों का एक वर्ग नारीवाद को ही बबलगम कहकर खारिज कर रहा था, जबकि ऐसा करते समय खुद मानक आचरण का उदाहरण नहीं पेश कर रहा था। तरुण तेजपाल कोई गुमनाम नागरिक नहीं थे। वे तहलका के संस्थापक और प्रधान संपादक थे तथा भारत के सबसे चर्चित खोजी पत्रकारों में से एक थे। उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा शक्तिशाली लोगों और संस्थाओं को बेनकाब करने पर बनी थी। इसलिए भी उनके खिलाफ लगे आरोपों की खासतौर पर कठोर जांच की अपेक्षा थी। लेकिन इसके बजाय, सार्वजनिक विमर्श का एक बड़ा हिस्सा उस महिला की पड़ताल में बदल गया, जिसने आरोप लगाया था। उसके मैसेजेस चेक किए गए। उसके आचरण का परीक्षण किया जाने लगा। तेजपाल और उनके परिवार से उसके संबंधों की भी तफ्तीश हुई। उसकी विश्वसनीयता को परखा गया। उसके व्यवहार में पाई गई किसी भी अस्पष्टता को उनके आरोपों की सच्चाई पर संदेह करने का अवसर बना लिया गया। इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी पीड़िता के बयान को जांच-पड़ताल से परे मान लिया जाना चाहिए। पत्रकारिता कोई एक्टिविज्म नहीं है। आरोपों की जांच होनी चाहिए। साक्ष्य मायने रखते हैं। आरोप लगाने वाले के व्यक्तित्व के विरोधाभासों का भी मुआयना किया जाता है। फिर आरोपी के भी कुछ अधिकार होते हैं और कानूनी प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं। लेकिन किसके व्यवहार पर पूछताछ की जाती है और किसकी प्रतिष्ठा की रक्षा की जाती है- यह भी अपने आप में पत्रकारिता के मूल्यों से जुड़ा सवाल है। मी-टू आंदोलन के दौरान मैंने ऐसे कई लोगों को सार्वजनिक रूप से सवालों के दायरे में रखा, जो मेरे दोस्तों में शुमार थे। ये अमीर और शक्तिशाली लोग थे। ऐसा करने की मुझे कीमत चुकानी पड़ी। कुछ लोगों ने मुझसे बात करना बंद कर दिया। कुछ ने मुझे काम देना बंद कर दिया। मैंने दोस्त खोए, पेशेवर रिश्ते खोए। लेकिन मेरा मानना था कि दोस्ती सिद्धांतों से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकती। दिलचस्प बात यह है कि उनमें से कुछ लोग आखिरकार वापस लौटकर आए और उन्हें वास्तव में अपने किए पर पछतावा था। उन्होंने मुझसे कहा कि उन्होंने अपने व्यवहार में बदलाव किया है। वे यह समझने लगे थे कि उनके पालन-पोषण या पेशेवर माहौल में जिन चीजों को सामान्य मान लिया गया था, यह जरूरी नहीं था कि वे स्वीकार्य भी हों। उन्होंने माना कि जिस व्यवहार को वे सामान्य समझते थे, वह वास्तव में यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आ सकता है। मेरे लिए जवाबदेही का यही मतलब है। और अगर मेरे जैसा कोई व्यक्ति दोस्ती को एक तरफ रख सकता है, तो उन शक्तिशाली संस्थानों के पास क्या बहाना है, जो दशकों से खुद को नारीवाद, समानता और जवाबदेही के पैरोकार के रूप में पेश करते आते रहे हैं? जब शक्तिशाली व्यक्ति कोई दोस्त, सहकर्मी, मार्गदर्शक हो, तो सत्ता के सामने सच बोलने का सिद्धांत समझौते का विषय क्यों बन जाता है? क्योंकि किसी पीड़िता से सवाल करना और सत्ता से सवाल करना, दोनों में फर्क है। जो लगातार पहले विकल्प को चुनते हैं और दूसरे से बचते हैं, उन्हें साहसी नहीं कहा जा सकता। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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