टिपण्णी

रश्मि बंसल का कॉलम: जो नींद से नाता बना रहे तो जीवन की गाड़ी चलती रहे

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कल मैंने बहुत इंतजार किया। पर कमबख्त आई नहीं! छत की तरफ देखा, खिड़की की तरफ देखा, कि कहीं चुपके से कमरे में घुसने की कोशिश तो नहीं कर रही? क्या वह मुझसे नाराज थी? अगर हां तो बताए मुझसे क्या भूल हुई? वो आजकल मुझसे दूर-दूर क्यों रहती है? नहीं, यह कोई रोमांटिक फिल्मी डायलॉग नहीं, मेरा कड़वा सच है। मुझे आजकल बड़ी मुश्किल से नींद आती है! अचम्भे की बात है। क्योंकि एक समय था जब नींद मेरी सच्ची सहेली थी। कॉलेज में कोई बोरिंग क्लास चल रही हो, वो मेरे पास आकर बैठ जाती। कि चल, लोड न ले, मैं हूं ना! बड़ी चंचल थी मेरी यह सहेली। सुबह फाइनल एग्जाम है, और रात को वो मेरे कान में फुसफुसाती- ‘तुझे सब तो आता है, बार-बार क्यों पढ़ रही है? किताब बंद कर, और चल मेरे साथ!’ तब वहीं टेक्स्ट-बुक पर माथा टेककर मैं अपनी इस सहेली का दुपट्टा पकड़कर निद्रावन की सैर पर निकल पड़ती। जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, जिम्मेदारियां बढ़ने लगीं। घर का काम, ऑफिस का काम, इन सब में इतनी उलझ गई कि कई बार जब मेरी सहेली आती तो मैं उसे भगा देती। कहती कि जा, मैं बहुत बिजी हूं। और तो और, मैंने कुछ नई संगत भी अपना ली। बुरी संगत! कुछ लोग सिगरेट पीते हैं, अपना स्ट्रेस कम करने के लिए। मैंने भी ऐसा ही एक फालतू दोस्त बना लिया, जो मेरी उंगलियों के इशारे पर नाचता है। लेकिन ऐसा तो मुझे लगा था। सच्चाई यह थी कि वो मुझे नचा रहा था! आप समझ गए होंगे, वो नालायक शख्स मेरा मोबाइल फोन है! जी हां, सोने के पहले मैं उसकी रील्स की दुनिया में मशगूल रहने लगी। दो-तीन घंटे कैसे गुजर जाते, पता ही नहीं लगता। जब नींद आती भी तो दबे पांव चली जाती। और कुछ समय से तो उसने हताश होकर आना ही बंद कर दिया है। तब पता चला, कि पानी सर के ऊपर चढ़ गया है। इंटरनेट पर छानबीन की। बहुत सलाहकार हैं। सोने से पहले हल्दी दूध पियो, कोई बोला। सुगंध वाला कैंडल जलाओ, मोटे-मोटे पर्दे बनवाओ। सब किया पर नींद फिर भी नहीं आती। जितना उसके बारे में सोचो, वो उतना ही दूर भागती। आखिर इस समस्या का हल क्या है? नींद! गहरी, मीठी, मजेदार नींद। यह वो सौगात है जिसे न खरीदा जा सकता है, न बेचा जा सकता है।
लेकिन लापरवाही से आप इसे खो जरूर सकते हो, और फिर उसे ढूंढकर लाना मुश्किल।
बचपन में वो हम सबके पास थी। बस में बैठे हुए, ट्रेन में लेटे हुए, कहीं भी, कभी भी आ जाती थी।
लेकिन आज तो बिजनेस क्लास में सफर करते हुए भी बहुतों को प्राप्त नहीं।
दुनिया-जहान की फिक्र करने वालों को यही अभिशाप मिलता है। इसी भावना को व्यक्त करने वाली कुछ पंक्तियां चलते-चलते सुनें : कल बच्चे की फीस भरनी है, पैसे कम हैं।
किसी ने कोई खो दिया, आंखें नम हैं।
जब दिल पर बोझ हो नींद आती नहीं
सोच-सोचकर परेशानी जाती नहीं।
हां, अगर एक रात गहरी नींद मिल जाए।
अगली सुबह एक नया जोश हम पाएं
नींद है हर मर्ज की दवा।
होने दो सारी दुनिया बेवफा।
अगर नींद से नाता बना रहे
जीवन की रेलगाड़ी चलती रहे
मैं फिर अपनी सहेली को पुकार रही हूं।
आ जा, तेरा दुपट्टा पकड़ने को तैयार हूं
छोड़ दी वो झूठी दोस्ती-यारी
अब तो मान जा, निंदिया प्यारी! (ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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