रश्मि बंसल का कॉलम:  फोन हमारा साथी और सहारा है, पर इंसान से नहीं प्यारा है
टिपण्णी

रश्मि बंसल का कॉलम: फोन हमारा साथी और सहारा है, पर इंसान से नहीं प्यारा है

Spread the love




कुछ दिन पहले एक हादसा हो गया!
मेरा सहारा, मेरी आंखों का तारा, मेरा फोन स्वर्ग सिधार गया! कई दिनों से मिन्नत कर रहा था, कि बस करो। इतनी फोटो, इतने ऐप मेरा नन्हा-सा शरीर सह नहीं पा रहा। लोड थोड़ा कम कीजिए।
खैर, उस दिन थोड़ा-सा पानी ढुल गया और फोन महाशय उसी चुल्लू भर पानी में डूब गए! किसी ने कहा कि चावल की बोरी में डाल दो, मानो उन दानों में कोई चमत्कारी जिन्न बैठा हुआ हो। खैर, रात भर ऐसे-वैसे नुस्खे अपनाए, कि शायद कुछ असर हो जाए। सुबह बटन दबाने पर हल्का-सा प्राण प्रकट हुआ, मगर फिर बॉलीवुड के मरते हुए हीरो की तरह, कुछ आहें भरने के बाद जनाब ने दम तोड़ दिया।
पता चला जिंदगी सिर्फ फोन की ही नहीं, मानो मेरी भी खत्म हो गई हो! पर्स खो जाए तो दुख होता है, पर लाइफ गोज ऑन। लेकिन फोन मर जाए तो इंसान बेसहारा जैसा फील करने लगता है।
घर से, ऑफिस से, अमेजन से- कितने ही लोग कॉन्टैक्ट करना चाह रहे हैं। लेकिन आपका तो जैसे अस्तित्व ही खत्म हो गया हो। आदमी दरवाजे पर पार्सल के साथ खड़ा है- ओटीपी प्लीज मैडम। कहां से दूं भैया, ले जाओ वापस। घर से लोग अपने काम से निकल गए, अब मुझे जाना है- टैक्सी कैसे मंगाऊं? छोड़ो काली-पीली टैक्सी ले लेती हूं। मगर देखा पर्स में सौ रुपए भी नहीं- यूपीआई पेमेंट की जो आदत है।
खैर, किसी तरह मोबाइल रिपेयर वाले तक मैं पहुंची। कि शायद फोन मेरे ही घर में पुनर्जन्म ले ले, थोड़ी झाड़-फूंक से। टेक्नीशियन ने गम्भीरता से कहा, कोशिश करता हूं, गारंटी नहीं दे सकता। पैसे भी कुछ ज्यादा मांग रहा था। तो मैंने कहा- भूल जाओ, नया खरीद लेते हैं।
अब फोन मिलते हैं दो तरह के :
आम फोन, यानी कि एंड्रॉयड। और ‘सेब’ वाला फोन, यानी कि एप्पल।
जो आम का शौकीन है वो सेब से चिढ़ता है, और जो सेब पसंद करता है वो आम वालों को कुछ समझता ही नहीं।
मुझे किसी ने सालों पहले एक ‘सेब’ गिफ्ट किया था, चखने के लिए। अफसोस, तब से मैं उसकी दीवानी हो गई थी। हमेशा की तरह, ‘सेब’ के शोरूम में नई ‘फसल’ आई हुई थी। देखने में एक जैसे मगर कीमत में अंतर, जैसे फल के मामले में अकसर होता है।
फर्क बस यह कि खाने वाला सेब 300 रुपए किलो और पॉकेट में रखने वाला सोने-चांदी वाली रेंज में। वैसे अब शादियों में भी असली सोना कौन पहनता है? नकली माल भी फोटो में बढ़िया चमकता है। तो फोन पर ही खर्च कर लेते हैं।
बड़े लाड़-प्यार से नई-नवेली दुल्हन समान फोन की विदाई हुई शोरूम से। लेकिन पहले पहनाया एक ‘घूंघट’- यानी कि कवर- ताकि उसके रूप को नजर न लग जाए। घर पहुंचकर सब इकट्ठा हुए, मुंह दिखाई के लिए। सब को पसंद आया, पड़ोसियों में खबर फैली तो खुसर-पुसर भी हुई। हर कोई कहता जरा मिलवा दो, कुछ के चेहरों पर जलन भी दिखाई दी। आखिर खानदान का फर्क तो पड़ता ही है। दीवान-ए-आम नहीं, हमारी लाड़ली दीवान-ए-खास जो थी! समस्या यह, कि मेरा मन ही नहीं करता इस कन्या से कोई काम करवाने का। डर था कि उसकी कोमल त्वचा पर खरोंच न आ जाए। बाथरूम में तो उसका जाना बिल्कुल मना, फिसलने का जो डर। और फिर एक दिन चलते-चलते वो मेरे हाथ से छूट कर जमीन पे गिर पड़ी। गनीमत है चोट नहीं लगी, मगर मानो उस दिन से वो भय निकल गया। एक महीना हो गया है। घर के इस नए सदस्य ने ढेर सारे ऐप्स, मैसेजेस और फोटोज अपने 256 जीबी वाले दिल में समा लिए हैं। कोई सवाल हो या कोई तकलीफ, वो मेरी मदद के लिए हाजिर। घर में पनीर चाहिए या फिर प्लम्बर जी आइए। जो मन चाहे बस बटन दबाइए। दस रुपए की चाय हो, बीपी की दवाई हो। केवाईसी फिर करना है, फैमिली ग्रुप में लड़ना है। ट्रेन में थोड़ा टाइमपास, आज कौन जीता है टॉस। छोटी-सी जान में समस्त दुनिया समाई है, लेकिन स्क्रीन से आंख उठाने में भी भलाई है। फोन मेरा साथी, मेरा सहारा। लेकिन नहीं है इंसान से वो प्यारा।
फोन को जरा पिंग होने दो, बातों में हमको खोने दो। दस रुपए की चाय हो, बीपी की दवाई हो। केवाईसी फिर करना है, फैमिली ग्रुप में लड़ना है। ट्रेन में थोड़ा टाइमपास, आज कौन जीता है टॉस। छोटी-सी जान में समस्त दुनिया समाई है, लेकिन स्क्रीन से आंख उठाने में भी भलाई है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *