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रश्मि बंसल का कॉलम: मन जो कहता है वो पढ़िए, पर शब्दों की पहली सीढ़ियां तो चढ़िए

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3 घंटे पहले

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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर - Dainik Bhaskar

रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

बचपन में न तो टीवी था न मोबाइल, तो बच्चे छुट्टियों में क्या करते थे? कॉमिक्स पढ़ते थे। खरीदने का तो सवाल ही नहीं, हम पढ़ते थे किराये पर।

कहलाती थी वो लाइब्रेरी, पर होती थी एक छोटी-सी दुकान, जिसमें कॉमिक्सों के अनगिनत अंकों का ढेर हमारे लिए किसी खजाने से कम नहीं था। और उस ढेर में से अपनी पसंद की कॉमिक्स ढूंढने का एक अलग ही मजा होता था। जिनकी आंखों की रफ्तार तेज होती, उनके हाथों में बार-बार पढ़े हुए अंक आते और वो कहते- भैया, कुछ नया दो ना। भैया के साथ सेटिंग हो तो वो आपके लिए लेटेस्ट कॉमिक्स छुपाकर भी रखते, मगर इस हिदायत के साथ कि कल जरूर लौटा देना!

एक बड़े से रजिस्टर में आपके नाम का एक अकाउंट होता था, जिसमें हिसाब नोट किया जाता- शायद 25 पैसे के रेट से एक कॉमिक्स मिलती थी। कुछ साल बाद महंगाई के कारण दाम 50 पैसे हो गया। आधी कॉमिक्स तो कई बार वहां खड़े-खड़े ही हम चाट जाते। खैर, दोबारा भी पढ़ने में हमें कोई आपत्ति नहीं थी।

जिस तरह चाय-सुट्टे की दुकान पर महीने के अंत में अकाउंट सेटल करना पड़ता था, इसी तरह लाइब्रेरी में होता था। कई बार मम्मी से थोड़े एक्स्ट्रा पैसे मांगने पड़ते, क्योंकि ऐसा फिक्स्ड बजट तो था नहीं। मम्मी-पापा की बस एक ही शिकायत थी- खूब पढ़ो, मगर असली किताबें पढ़ो। कॉमिक्सों में क्या रखा है?

सबसे ज्यादा डिमांड वाली कॉमिक्स थीं चाचा चौधरी, बेला-बहादुर, फैंटम और आर्चीज की। मेरा पसंदीदा पात्र था मैंड्रेक द मैजिशियन, लेकिन सच कहूं तो जिन कॉमिक्स ने मेरा दिल पूरी तरह से जीत लिया था उनका नाम था अमर चित्र कथा।

मेरे पिताजी के दोस्त लिंकन अंकल इंडिया बुक हाउस में नौकरी करते थे। वो जब आते तो साथ में 1-2 अमर चित्र कथा लाते। भारत के इतिहास की जितनी जानकारी स्कूलों में दी गई, उससे दोगुनी मैंने अमर चित्र कथा से पाई हैं। अशोक हो या राणा प्रताप, उसमें छपी हुई छवि मन में आज भी हूबहू मौजूद है।

पंचतंत्र, पौराणिक कथाएं, यहां तक कि कालिदास के नाटक मृच्छकटिकम् का आभास भी हमें अमर चित्र कथा ने ही कराया। अकबर का जिक्र तो सिलेबस में था मगर बीरबल की सूझ-बूझ कैसे पता चलती? झांसी की रानी से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक सचमुच उनकी प्रकाशित हर चित्रकथा अमर थी।

सोचती हूं, इस स्टाइल से अगर बच्चों को पढ़ाया जाए, तो उनको इतिहास से प्यार हो सकता है। क्या जरूरी है कि हमारी सिलेबस की पुस्तकें इतनी बोरिंग हों? शायद टेक्स्ट-बुक से तंग आजकल की युवा पीढ़ी को किताबों से ही चिढ़ हो गई है। उनके मन में पढ़ने का मतलब हो गया है रट्टा और रिवीजन।

पढ़ो एग्जाम के लिए। कॉम्पीटिशन के लिए। पढ़ना माने दिमाग का दही। कंधों पर एक भारी बस्ते का बोझ। करियर बनाने का बस एक साधन। सिर्फ आनंद के लिए भी कोई पढ़ता है? आज के कई बच्चों के लिए यह किसी अजूबे से कम नहीं।

हां, आज के दौर में मोबाइल पर आपको बहुत सारा मनोरंजन उपलब्ध है। लेकिन पढ़ने से अरुचि का कारण सिर्फ वो नहीं। कॉमिक्स का महत्व यह है कि उसे पढ़ना आसान है। कहानी जब सिर्फ अक्षरों नहीं, चित्रों के साथ भी वर्णित होती है, तो ज्यादा रोमांचक होती है।

इसलिए हमें चाहिए बहुत सारे नए आर्टिस्ट, लेखक और प्रकाशक, जो साथ जुड़कर नया ट्रेंड शुरू करें। आज की स्टाइल में, आज की भाषा में हमारे देश की पुरानी एवं नई कहानियों को फिर से कॉमिक्स का रूप मिले। इसमें एआई की भी मदद ली जा सकती है।

स्क्रीन्स के आक्रमण में कब वो छोटी-सी दुकानें बंद हो गईं, पता ही नहीं चला। उन्हें हमें वापस लाना होगा। हर मोहल्ले में हो एक लाइब्रेरी, जहां बच्चे और बड़े कॉमिक्सों के ढेर में से अपने मनपसंद अंक चुन सकें। जहां कुछ देर को मोबाइल से हमारा ध्यान हट जाए। जहां हम पन्नों को उलटने का आनंद पाएं!

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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