रसरंग में चिंतन:  इस संसार में एकमात्र स्थायी चीज है परिवर्तन
अअनुबंधित

रसरंग में चिंतन: इस संसार में एकमात्र स्थायी चीज है परिवर्तन

Spread the love


गुणवंत शाह5 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

आज सुबह की सैर के दौरान एक विचार मन में आया और मन प्रफुल्लित हो गया। बिना विचार के कोई भी व्याकुलता मन को सुखी नहीं कर सकती। यह व्याकुलता अभी ताजा है, इसलिए उस पर लेखन भी जारी है। ऐसी व्याकुलता का मालिक होना, यानी परमात्मा की कृपा का पात्र होना है। इस भ्रम को बनाए रखने की ललक जाती नहीं और उसे छोड़ने का भी मन नहीं करता। विचारों की व्याकुलता के अलावा मुझे किसी व्याकुलता के बारे में कुछ भी नहीं मालूम। वह विचार, जो ऐसी व्याकुलता तक पहुंचाए, यदि मौलिक हो तो वह ‘अपौरुषेय’ (यानी किसी व्यक्ति विशेष का नहीं) कहलाता है। गांधीवादी दादा धर्माधिकारी कहा करते थे: जैसी आकांक्षा, वैसा अवतार। जब हिंसा बढ़ने लगी, तब समाज में करुणा की तड़प जागी और भगवान बुद्ध का अवतार हुआ। बुद्ध करुणामूर्ति थे, अर्थात करुणा के मूर्तिमान स्वरूप। वे निरीश्वरवादी थे। जहां उन्होंने अपने प्राण त्यागे, वह स्थान आज कुशीनगर के नाम से जाना जाता है। अनेक लोगों के लिए वह तीर्थस्थान है।

अपनी अंतिम अवस्था में बुद्ध जहां लेटे थे, उस स्थान को अंग्रेज ‘रेक्लाइनिंग बुद्धा’ कहते हैं। यह तीर्थस्थल आज दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। जीवन में जितना लोभ करना हो, उसे सीमित कर लो। जितनी घृणा करनी हो, उसे भी सीमित रूप में करो। जितना संग्रह करना हो, उसे भी एक निश्चित माप में करो। जितनी ईर्ष्या करनी हो, वह भी संयम से करो। मृत्यु के बाद ऐसा अवसर नहीं मिलेगा। जीवन जीते हुए गंदे तरीकों से कमाए धन के बाद सुखद मृत्यु की आशा ही छोड़ दो।

बुद्धत्व की तलाश:

मैं लोगों से यही कहूंगा कि उन्हें एक बार महान उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ को अवश्य पढ़ना चाहिए। इस उपन्यास में एक युवक का वर्णन है, जो सब कुछ छोड़कर बुद्धत्व की तलाश में निकल पड़ता है। इसी उपन्यास पर आधारित एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है। फिल्म में वह किसी नगरवधू से मिलता है। उस पात्र को सिमी गरेवाल ने निभाया था और सिद्धार्थ की भूमिका शशि कपूर ने।

सिमी, सिद्धार्थ से पूछती है: ‘सिद्धार्थ! जो मुझसे मिलने आता है, वह अपने साथ कोई न कोई कीमती उपहार अवश्य लाता है। तुम मुझे क्या दोगे?’ सिद्धार्थ का उत्तर अत्यंत भावपूर्ण होता है: ‘मैं प्रतीक्षा कर सकता हूं, मैं सोच सकता हूं, मैं व्रत कर सकता हूं।’ सिमी अपना प्रश्न दोहराती है। सिद्धार्थ फिर वही तीन बातें दोहराता है। देखा जाए तो इन तीन बातों में ही उपन्यास और जीवन का सार समाया है। कोई उपन्यास जीवन के इतने निकट पहुंच सकता है भला?

हर क्षण में संपूर्ण जीवन:

जब एक बुलबुला दस सेकंड तक नहीं फूटता तो बाकी बुलबुले कहते हैं, ‘दादा, बहुत लंबा जी गया!’पतंगे के जीवन में कोई कैलेंडर नहीं होता। किसी भी क्षण को बांहों में भरने की शक्ति कैलेंडर के पास कहां? पतंगा स्वभावतः विक्रम संवत, ईस्वी या हिजरी जैसी किसी भी गणना से परे होता है। मानव जीवन भर तरह-तरह के फॉर्म भरता रहता है। दो पैरों पर खड़े इस जीव की जाति में सदियों से कॉलम भरे जाते रहे हैं। फॉर्म में एक जानकारी भरनी होती है। वह है ‘स्थायी पता’। जब कोई व्यक्ति मात्र आदतवश अपना स्थायी पता भरता है तो वह यह भूल जाता है कि इस क्षणिक संसार में यदि कोई चीज वास्तव में स्थायी है तो वह है परिवर्तन। जिस क्षण नदी बहना बंद कर दे, उस क्षण वह नदी रह ही नहीं जाती। परिवर्तन का वाहन क्षण होता है। बहते रहना और निरंतर बहते रहना, यही तो नदी का स्वधर्म है।

महान विचारक हेराक्लाइट्स ने ठीक ही कहा है: आप एक ही नदी में दो बार स्नान नहीं कर सकते। नदी पल-पल बदलती रहती है। जब आपने नदी में पहली बार स्नान किया और दूसरी बार फिर से उसी में उतरने गए तो वह नदी एकदम नई होती है, क्योंकि जिस जल से आपने स्नान किया था, वह तो बहुत दूर बह चुका होता है।

हेराक्लाइट्स की यह बात उपनिषदों की गहराई को छूती है। पतंगों के जीवन में भले ही कैलेंडर न हो, लेकिन क्षण तो होते ही हैं। हर क्षण एक संपूर्ण जीवन की तरह जीया जा सकता है, भविष्य की गणनाओं और अतीत की स्मृतियों के भार के बिना।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *