रूमी जाफरी3 घंटे पहले
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शोले के एक दृश्य में धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन।
15 अगस्त को ‘शोले’ को रिलीज हुए 50 साल हो रहे हैं। इन दिनों मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह बस ‘शोले’ की ही बातें हो रही हैं और होनी भी चाहिए। ‘शोले’ ने जो मुकाम हासिल किया है, वह न तो आज तक कोई और फिल्म हासिल कर सकी और न ही शायद भविष्य में कोई और कर पाए। मुझे लगता है कि आने वाले समय में कई फिल्में ‘शोले’ से ज्यादा कमाई कर सकती हैं, लेकिन ‘शोले’ का मुकाबला कोई नहीं कर पाएगी और ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं, उसका कारण भी मैं आपको बताना चाहता हूं।
‘शोले’ को रिलीज हुए पांच दशक हो गए, यानी कई पीढ़ियां बीत चुकी हैं। मगर ये फिल्म ऐसी है, जिसके किरदार, संवाद, कॉस्ट्यूम, तांगा और यहां तक कि घोड़ी भी आज तक जेहन में जिंदा हैं। आज भी वे लोग जो शोले के वक्त पैदा हुए थे और वे भी जो इसके 20-25 साल बाद पैदा हुए, इसके डायलॉग्स और किरदारों से वाकिफ हैं। स्टैंडअप कॉमेडी हो, विज्ञापन हो, एनिमेशन हो, ‘शोले’ के किरदार और डायलॉग्स आज भी हर जगह इस्तेमाल होते हैं। और मजे की बात यह है कि जनता इन्हें आज भी उतनी ही शिद्दत से पसंद करती है। अब सोचिए उस दौर की कहानी, जिसमें डाकू, घोड़े, टांगे और बिना बिजली वाला गांव दिखाया गया था। अब तो ये सब गुजरे जमाने की बात हो गई है।
मुझे याद है, उस जमाने में सिर्फ गानों के रिकॉर्ड ही आते थे और खूब बिकते थे। लेकिन ‘शोले’ से पहले अगर किसी फिल्म के डायलॉग्स का रिकॉर्ड आया और खूब बिका, तो वो थी ‘मुगल-ए-आजम’। शोले के संवादों की पॉपुलेरिटी का मैं खुद गवाह रहा हूं। मैं एक शादी में गया था, जहां बरात आ रही थी, निकाह हो रहा था, रुखसती हो रही थी, मगर लाउडस्पीकर पर गाने नहीं, ‘शोले’ के डायलॉग्स बज रहे थे। जब वो रिकॉर्ड खत्म हो जाता, तो लोग फिर से डायलॉग बजाने की फरमाइश करते। ऐसी थी शोले की मकबूलियत। इसी बात पर मुझे एक शेर याद आता है:
चाल वो चल कि पसे-मर्ग तुझे याद करें,काम वह कर कि जमाने में तेरा नाम रहे
एक किस्सा मैं आप लोगों से साझा करना चाहता हूं, जो मुझे खुद जावेद साहब ने सुनाया था। उन्होंने बताया कि जब वे भोपाल में पढ़ाई कर रहे थे, तो वहां एक होटल था, अहद होटल। वहां के मैनेजर ताज भोपाली अच्छे शायर भी थे और जावेद साहब कभी-कभी वहां खाना खाने जाया करते थे।
जावेद साहब ने बताया कि 1957 में जब ‘नया दौर’ फिल्म की शूटिंग भोपाल में हो रही थी, तो जूनियर आर्टिस्ट्स का खाना उसी होटल से जाता था। ताज साहब खाना लेकर जाते थे और वहां उनकी दोस्ती हो गई एस.एम. सागर से। फिर बात आई-गई हो गई। पांच साल गुजर गए। 1961 में जावेद साहब अभी भी भोपाल में ही रहकर पढ़ाई कर रहे थे। इस दौरान उनकी भी दोस्ती ताज साहब से हो गई। इसके बाद जावेद साहब बंबई आ गए और वहां कमाल अमरोही साहब के असिस्टेंट बन गए। फिर उन्हें छोड़ भी दिया।
जावेद साहब बताते हैं, एक दिन बंबई में उनकी मुलाकात अचानक ताज भोपाली से हो गई। ताज भोपाली ने बताया कि एस.एम. सागर अब प्रोड्यूसर बन गए हैं और उन्होंने मुझे (ताज भोपाली) गाने लिखने के लिए बुलाया है। ताज साहब तब जावेद साहब को भी एस.एम. सागर से मिलवाने ले गए। सागर ने जावेद साहब को अपना असिस्टेंट बना लिया और फिल्म बनाई ‘समुद्री लुटेरा’। इसी फिल्म के दौरान जावेद साहब की मुलाकात हुई सलीम साहब से। बाकी तो आपने नेटफ्लिक्स की डॉक्युमेंट्री ‘एंग्री यंग मैन’ या इंटरव्यूज में देखा-पढ़ा ही होगा कि कैसे ‘सलीम-जावेद’ की जोड़ी बनी और फिर ‘शोले’ वजूद में आई।
जावेद साहब मुझसे बोले, ‘रूमी साहब, जरा सोचिए, अगर वो अहद होटल ना होता, या उसके मैनेजर ताज साहब शायर ना होते, तो उनकी दोस्ती एस. एम. सागर से नहीं होती। और फिर सागर उन्हें बंबई नहीं बुलाते और न मेरी उनसे मुलाकात होती, न सलीम साहब से, और न सलीम-जावेद की जोड़ी बनती… और शायद फिर ‘शोले’ भी नहीं बनती।’
एक और बात बताना चाहता हूं, जो शायद बहुत कम लोगों को पता होगी। सभी लोग ‘शोले’ के किरदार सूरमा भोपाली से तो परिचित हैं ही। लेकिन जब एस.एम. सागर के यहां जावेद साहब असिस्टेंट थे, उस समय उन्होंने सूरमा भोपाली का किरदार लिखने से पहले सागर साहब की फिल्म ‘अधिकार’ के लिए ‘बन्ने भोपाली’ का किरदार लिखा था। इसे प्राण साहब ने निभाया था और यह भी बड़ा हिट हुआ था।
आज सलीम-जावेद के सम्मान में उनकी ही लिखी फिल्म ‘दोस्ताना’ का ये गीत याद आता है। इसे सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए।
बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा
सलामत रहे दोस्ताना हमारा…








