गुणवंत शाह3 घंटे पहले
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हम सब एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं, जहां मानव को अपने सबसे प्रिय और एकमात्र हृदय की देखभाल करनी होगी। सहृदयता के बिना प्राप्त समृद्धि रावणत्व की जननी है। संवेदनशील हृदय का स्वामी होना ही असली समृद्धि का गौरीशंकर है। तंबाकू के विशाल खेत की तुलना में तुलसी का पौधा अधिक मूल्यवान है। रावण के पास क्या नहीं था, उसके पास सोने की लंका थी, फिर भी वह गरीब था। दूसरी ओर शबरी के पास केवल कुछ बेर थे, फिर भी वह समृद्ध थी। हर मानव के पास एक छलकता हुआ हृदय होता है, किंतु अब वही हृदय विलुप्ति के कगार पर है।
आज की दुनिया में चारों ओर चालाकी के बीज बोए जा रहे हैं। हर दुकान में चालाकी का व्यापार होने लगा है। हर कार्यालय में चालाकी का बोलबाला है। इंसान अपनी सारी चालाकी दूसरों को ठगने में लगा देता है। इसके बाद जो थोड़ी-बहुत चालाकी बचती है, उसे लेकर वह मंदिर की ओर जाता है। वहां जाकर दानपेटी में कुछ सिक्के डालता है और सीढ़ियां उतरते हुए सोचता है कि अब उसके आराध्य उसे और पीड़ाएं नहीं देंगे। दानपेटी में पुजारी की रुचि हो सकती है, ईश्वर की नहीं। ईश्वर की रुचि दानपेटी में नहीं, बल्कि ‘हृदय पेटी’ में होती है।
डेनियल गोलमैन अपनी किताब इमोशनल इंटेलिजेंस में इंसान की भावनाओं की महिमा का वर्णन करते हैं। यह मंदिर हमारे हृदय में स्थित है। वे हृदय को ‘इमोशनल ब्रेन’ कहते हैं। कई लोगों के पास तेजस्वी मस्तिष्क होता है, लेकिन संवेदनशील हृदय नहीं होता। ऐसे लोग सब कुछ पा सकते हैं, पर प्रेम के प्रसाद से वंचित रह जाते हैं। उनके बंगले में बहुत से सुरक्षाकर्मी होते हैं, बंगला रोशनी से जगमगाता है, पर प्रेम के अभाव में वे सबसे गरीब होते हैं। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो ऐसे बंगले में एक आभासी गरीबी छिपी होती है जो बाहर से रौनकदार दिखती है। ऐसे घरों में संवेदनाओं का वैभव नहीं होता, इसलिए कवियों का प्रवेश वहां संभव नहीं। गोलमैन ऐसे लोगों को ‘इमोशनल इललिटरेसी’ यानी भावनात्मक निरक्षरता कहते हैं। किसके घर नहीं जाना चाहिए, इसकी गहरी समझ कवियों, कलाकारों और कथाकारों के पास होनी चाहिए। दुर्योधन के मेवों से अधिक स्वाद विदुर की सादी सब्जी में था, यह कृष्ण ने सिद्ध कर दिया।
हम एक मायावी दुनिया में रहते हैं, जहां मनुष्य सामने वाले के इरादों को तो भांप लेता है, पर उसका हृदय पहचानने में चूक जाता है। टीवी धारावाहिकों में सामने वाले की चालों की तर्कभरी जलेबी बनती रहती है। जिस मित्र से धोखे की कल्पना भी न की हो, जब वही धोखा देता है, तब हृदय टूट जाता है। वह हृदय चालाक व्यक्ति का नहीं होता, टूटता वही हृदय है जो वास्तव में ‘हृदय’ है। व्यापार प्रधान समाज में पैसों के लिए धोखा देने का चलन बढ़ गया है।
जब मानवीय रिश्तों की मिठास घटती है तो टूटे हुए लोगों की संख्या बढ़ती जाती है। तब मनुष्य की सहायता के लिए सामने आते हैं तंबाकू, शराब और अन्य नशीले पदार्थ। जब भावनाओं की भूख नहीं मिटती तो दूसरी भूख पैदा होती है। चालाकी के चक्रव्यूह में भावनाएं जलती रहती हैं। व्यसनों के मूल में इसी अग्निस्नान की पीड़ा छिपी होती है। ईश्वर जैसा कोई आश्वासन नहीं और दूसरे स्थान पर नशा। ईश्वर को प्रेम से लबालब हृदय चाहिए, सिक्के नहीं। यह तो तय है कि चालाक व्यक्ति का हृदय हमेशा खाली रहता है।
हृदय धोखा सह सकता है, पर धोखा दे नहीं सकता। धोखा देने का काम उसने मस्तिष्क पर छोड़ दिया है। कंप्यूटर मस्तिष्क को समझ सकता है, पर हृदय को नहीं। मस्तिष्क का विकास करने में वैज्ञानिक सफल हुए हैं, पर हृदय का विकास आज तक नहीं हो पाया। आज दुनिया की अनेक समस्याओं की जड़ में अविकसित हृदय की अतृप्त कामनाओं की चीखें सुनाई देती हैं। कभी-कभी इच्छा होती है कि घर के दरवाजे पर एक तख्ती टांग दूं, जिस पर लिखा हो, ‘खाली हाथ आओ, पर खाली हृदय न आओ।’
टेक्नोलॉजी ने नया धर्म ओढ़ लिया है। गणेश की जगह कंप्यूटर ने ले ली है। टेलीकम्युनिकेशन ने भौतिक दूरी को मिटा दिया है। ईश्वर अब ‘सुविधा’ बन गया है। पेनकिलर की गोली पीड़ानाशिनी माता बन गई है। दुनिया छोटी होती जा रही है, लेकिन हृदय का विस्तार नहीं हो रहा। आज इंसान के भावनात्मक घेरे में कभी-कभी माता-पिता तक शामिल नहीं हो पाते।
मन की वृत्ति बदलना जरूरी
थॉमस पेन अपनी किताब द एज ऑफ रीजन में कहते हैं, ‘मेरा मन ही मेरा चर्च है।’ अगर यह कथन सही है तो फिर चर्च जाने की क्या आवश्यकता? इंसान मंदिर या मस्जिद भी जाता है, फिर रोजमर्रा के कामों में लग जाता है। इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन जब प्रेयर, पूजा या नमाज के बाद भी मन की वृत्ति नहीं बदलती तो समझ लेना चाहिए कि वह कर्म केवल दिखावा है। रोज-रोज पूजा करने से मन मंदिर नहीं बन जाता। दानचोरी, अधिकारियों का भ्रष्टाचार, बिल्डरों की ठगी, सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहता है।








