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इन दिनों मैं वसंत ऋतु में ही डूबा हुआ हूं। इसके वैभव को अनुभव कर रहा हूं। हम सबने अनुभव किया होगा कि इन दिनों प्रकृति के कण-कण से सुगंध फैल रही है। पूरे वातावरण में महक व्याप्त हो गई है। ऐसे में वसंत का एक अनोखा रूप हमारे सामने होता है, जो मन को विचलित कर देता है। वास्तव में वसंत का जन्म ही मानव को विचलित करने के लिए ही हुआ है। वसंत के आने के बाद भी जो इससे प्रभावित नहीं होते, उन्हें स्थितप्रज्ञ कहने की आवश्यकता नहीं है। सच्चा स्थितप्रज्ञ ऋतुगामी हो सकता है,पर ऋतु-प्रूफ नहीं। हमारे आसपास की प्रकृति निर्जीव नहीं है। उसमें चेतना की अनंत तरंगें निरंतर लहराती रहती हैं। कवि कालिदास जैसे प्रेम उपासक ने प्रकृति के साथ आत्मीयता को शब्दों में पूर्णता से व्यक्त किया है। वे नदियों को प्रिय मेघ के लिए तरसती प्रेयसियों के रूप में देखते हैं। शकुंतला तो प्रकृति की ही पुत्री है। वह कण्व ऋषि के आश्रम को छोड़कर ससुराल जाने को विदा लेती है, तब लताएं पीले पत्ते झाड़कर आंसू बहाती हैं (अपसृत पांडुपत्रा मुंचंति श्रुणीव लता)। वाकई, कालिदास तो कालिदास ही हैं।
प्रकृति थकान उतारने वाली :
प्रकृति से दूर होकर आजकल लोग कम काम करके भी अधिक थकने लगे हैं। प्रकृति स्वभाव से ही थकान उतारने वाली और तन-मन को ताजगी से भर देने वाली माता है। इस तरह से जीना कि थकान उतरे ही नहीं और फिर थकान मिटाने के लिए जीवन नष्ट कर देने वाले उपाय करना, यही आज का फैशन है। कुछ लोग हमेशा थके हुए दिखाई देते हैं, ऐसे लोग स्नान करने के बाद भी बाथरूम से बासी चेहरे के साथ निकलते हैं। ऐसे लोग लगातार काम के प्रति निष्ठावान होंगे, ऐसा भी नहीं है। थकान उनका स्थायी भाव होता है। औद्योगिक समाज में मनुष्य को दो बातें सूई की नोक की तरह लगातार चुभती रहती है। ये दो बातें हैं – थकान और ऊब। मशीनों के कारण सुखी लोगों की शारीरिक थकान कम हुई है, पर मानसिक थकान बढ़ गई है। मानसिक थकान मनुष्य की नींद छीन लेती है।
अगर ऋतुएं नहीं होतीं…
परिवर्तन की गति बढ़ गई है, इसलिए मनुष्य जल्दी ऊब जाता है। ऊब उसके बासीपन को ठोस बना देती है। ऊबा हुआ आदमी हर जगह नवीनता की तलाश करता है। चप्पल टिकाऊ हो, तो भी उसे पहनते-पहनते व्यक्ति ऊब जाता है। वह केवले टूथपेस्ट का ब्रांड ही नहीं, अपने जीवनसाथी को भी बदलने के लिए तैयार हो जाता है। उनकी ऊब का समाधान ‘वेरायटी’ शब्द में मिलता है। वह लगातार परिवर्तन चाहता है। हर वर्ष नए-नए हिल स्टेशन की तलाश में रहता है। ठीक उसी तरह, जैसे नए बिस्तर पर मरीज कुछ समय के लिए राहत महसूस करता है। वैसी ही राहत उसे परिवर्तन से मिलती है। जीवन में ऊब बहुत बढ़ जाए तो वह खुदकुशी तक कर लेता है। दिनचर्या की जड़ता से बचना और हर दिन का अछूते विस्मय के साथ स्वागत करना आज के युग का सबसे बड़ा पराक्रम है। ऐसे में ऋतुओं के आवर्तन और परिवर्तन बहुत सहायक होते हैं। यदि ऋतुएं न हों तो प्रकृति की लीलाओं से मानव अपरिचित ही रह जाएगा। पृथ्वी पर यदि ऋतुएं नहीं होतीं तो आत्महत्याओं की घटनाएं बहुत अधिक होती। जिस तरह से पेड़-पत्ते ऋतुओं के बहुत सूक्ष्म संकेतों को महसूस कर लेते हैं, वैसे ही मनुष्य को भी उन्हें महसूस करना चाहिए। लेकिन जो व्यक्ति इन प्राकृतिक संकेतों को समझ नहीं पाता, वह हर ऋतु को केवल ‘वात-पित्त-कफ’ जैसी शारीरिक बीमारियों से जोड़कर ही देखता है। वर्षा ऋतु मलेरिया और मंदाग्नि लाती है, तो शरद ऋतु सर्दी-जुकाम, वसंत कफ और ग्रीष्म पित्त का प्रकोप, इस तरह से ऋतु और रोग का संबंध बनता है, पर ऋतु और जीवन का सामंजस्य नहीं बन पाता। कैलेंडर की कैद में नहीं वसंत :
वसंत के अनंत उपकारों को न समझ पाने वाले मनुष्य ने थकान और ऊब की खोज की है। हर डाली, कली, पत्ते और पंखुड़ी पर कई दिनों तक सूर्य, वायु, वर्षा और ईश्वर मिलकर महीन कढ़ाई करते हैं, तब वसंत आता है। वसंत कैलेंडर की कैद में नहीं है, यह बुद्धिमत्ता छोड़कर प्रकृति के रंगसागर में डुबकी लगाने की ऋतु है। वसंत की मातृभाषा को कवि ‘प्रेम’ कहते हैं। वासंती नशा अनुभव करने में मौन बहुत ही सहायक है। जो व्यक्ति वसंत की छेड़छाड़ का आनंद नहीं ले सकता, उसे संसार की अन्य सारी पीड़ाएं सहने के योग्य माना जा सकता है। जिसे वसंत भी विचलित न कर सके, उसे अपने वस्त्र पर खोपड़ी का हडि्डयों वाला निशान छपवाकर बड़े अक्षरों में ‘डेंजर’ लिखवा लेना चाहिए। ऐसा व्यक्ति पास आए, तो मानो अलार्म बज उठे।
ऊब पैदा करने वाला कारखाना नहीं जीवन
वसंत के पास पूरे वर्ष की थकान और ऊब दूर करने की सारी सामग्री है। यदि कोयल की कूक भी हमारी थकान न मिटा सके, तो समझना चाहिए कि हम स्वयं ही थकाऊ और ऊबाऊ व्यक्ति हैं। जीवन थकान और ऊब पैदा करने वाला कारखाना नहीं है। जीवन तो हरी, कोमल घास पर ओस से भीगे पारिजात के फूलों को कुछ सूर्यकिरणों के साथ टोकरी में रखकर सुगंधित बने रहने की एक परम रोमांचकारी घटना है। जब यह परम घटना थकान, ऊब और दिनचर्या के बोझ में दब जाती है, तभी मनुष्य ‘स्टेटस’ पानी की कोशिश करता है।
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