पर्णश्री देवी18 मिनट पहले
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अष्टमुडी झील और कल्लाडा नदी के संगम पर स्थित मुनरो द्वीप केरल की एक बेहद शांत और कम भीड़ वाली जगह है। इसे स्थानीय लोग मुनरोएथुरुथु कहते हैं। कोल्लम से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर बसे इस द्वीप पर पहुंचते ही ऐसा लगता है जैसे समय की रफ्तार धीमी हो गई हो। यहां आठ छोटे टापुओं का समूह है और आज भी यह जगह भीड़-भाड़ से दूर है। यह जगह उन यात्रियों के लिए है, जो दिखावे से ज्यादा सादगी को महत्व देते हैं। असल में, केरल के बैकवॉटर की लंबी कहानी में मुनरो द्वीप एक शांत अध्याय जैसा है, जो यात्रा खत्म होने के बाद भी मन में बना रहता है, ठीक वैसे ही जैसे शांत पानी में आगे बढ़ती नाव की हल्की लहरें।
पानी के बीच बसे गांव : मुनरो द्वीप की खासियत उसकी सुंदरता तो है ही, लेकिन उसका इतिहास भी उतना ही दिलचस्प है। इस द्वीप का नाम ब्रिटिश अधिकारी कर्नल जॉन मुनरो के नाम पर पड़ा जो कभी त्रावणकोर रियासत के रेजिडेंट थे। उन्नीसवीं सदी में उनके समय में यहां जमीन सुधार और सिंचाई के काम हुए। दलदली जमीन को खेती लायक बनाया गया। इसके बाद यहां फिशिंग, नारियल से जुड़े काम और धान की खेती लोगों की आजीविका का आधार बने। धीरे-धीरे एक ऐसा समुदाय बना जो अपने आप में आत्मनिर्भर था। आज मुनरो द्वीप नारियल के पेड़ों, धान के खेतों और मैंग्रोव जंगलों तथा पानी के बीच बसे छोटे गांवों का सुंदर मेल है। यहां के कई घर पानी के बिल्कुल पास बने हैं और संकरी नहरें उनके सामने से गुजरती हैं। अलेप्पी जैसे व्यस्त बैकवॉटर के मुकाबले मुनरो द्वीप ज्यादा शांत और सुकून से भरा है। यहां प्रकृति और इंसान के बीच की दूरी बहुत कम नजर आती है।
संकरी नहरों से जीवन दृश्य : मुनरो द्वीप में बोट की सवारी सिर्फ घूमने का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवन को पास से देखने का तरीका भी है। छोटी डोंगी जब ताड़ के पेड़ों की छांव में बनी संकरी नहरों से गुजरती है तो आसपास के दृश्य खुद ब खुद ध्यान खींचते हैं। सुबह मछुआरे जाल डालते दिखाई देते हैं। महिलाएं नारियल के रेशों से रस्सी बनाती हैं। बच्चे लकड़ी के छोटे पुलों से हाथ हिलाते हैं और बुजुर्ग पानी के किनारे बैठकर बातें करते नजर आते हैं। यही दृश्य इस द्वीप की असली पहचान हैं। यह द्वीप आज भी केरल के उन चुनिंदा स्थानों में है जहां पारंपरिक कॉयर उद्योग जीवित है। नारियल के रेशों से बनने वाली रस्सियां और चटाइयां यहां के लोगों की आमदनी का बड़ा जरिया हैं। यहां छोटे मंदिर और चर्च एक साथ दिखाई देते हैं जो आपसी समझ और मेलजोल की मिसाल हैं। यह सब दिखावटी नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा लगता है।
प्रवासी पक्षियों का गढ़ : इस द्वीप को सही तरह से जानने के लिए यहां पूरा समय लेकर घूमना जरूरी है। यहां मोटरबोट की जगह हाथ से चलने वाली नावों का इस्तेमाल होता है, जिससे शांति बनी रहती है और पर्यावरण को नुकसान भी कम होता है। पक्षी प्रेमियों के लिए यह जगह खास है, क्योंकि यहां कई तरह के स्थानीय और प्रवासी पक्षी देखे जा सकते हैं, खासकर सुबह के समय।
होमस्टे में ठहरें, यादगार बन जाएगी यात्रा
कब जाएं? यहां घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच होता है, जब मौसम सुहावना रहता है। इस दौरान बोटिंग करना और घूमना आसान होता है। मानसून में बारिश ज्यादा होती है, लेकिन हरियाली और बादलों से ढका आसमान इस जगह को अलग ही खूबसूरती देता है।
कैसे जाएं? मुनरो द्वीप पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन कोल्लम है, जो केरल के बड़े शहरों से जुड़ा है। कोल्लम से टैक्सी या स्थानीय बस से यहां पहुंचा जा सकता है। कुछ हिस्सों में छोटी नाव से जाना पड़ता है जो यात्रा को और रोचक बना देता है।
कहां ठहरें? होमस्टे में ठहरना यात्रा को और यादगार बना देता है। सुविधाएं सादी होती हैं, लेकिन मेहमानों का स्वागत दिल से किया जाता है। घर का बना खाना जिसमें नारियल वाली करी और स्थानीय चावल शामिल होता है, स्वाद के साथ अपनापन भी देता है। चाहें तो कोल्लम में होटल में रुककर दिनभर के लिए भी मुनरो द्वीप की यात्रा की जा सकती है।








