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आज वाट्सऐप जनरेशन और स्नैपचैट जनरेशन के बीच संघर्ष चल रहा है। वाट्सऐप जनरेशन बड़ों का आदर करने और परंपराओं का पालन करने में विश्वास रखती है। उसका मानना है कि बड़ों की बातों पर कभी सवाल नहीं उठाने चाहिए, यानी आज्ञापालन ही सबसे बड़ा गुण है। वह इसे संस्कार के रूप में प्रस्तुत करती है। दूसरी ओर, स्नैपचैट जनरेशन के मन में केवल एक सरल-सा प्रश्न होता है : क्यों? इस प्रश्न से बुजुर्ग बेचैन हो जाते हैं। वे ऐसी सोच के लिए इंस्टाग्राम, नेटफ्लिक्स और विभिन्न डेटिंग ऐप्स को जिम्मेदार ठहराते हैं और कहते हैं कि युवा पीढ़ी भारतीय संस्कृति को भूल चुकी है। लेकिन संभव है कि युवा वह बात समझ गए हों, जिसे खुद बुजुर्ग भूल चुके हैं। वह बात, जिसे वेदव्यास हजारों साल पहले समझ गए थे – धर्म और आज्ञापालन एक ही चीज नहीं हैं। किसी आदेश का पालन करना और उसका धर्मसम्मत होना दो अलग बातें हैं। राजा ययाति को समय से पहले बूढ़े होने का श्राप मिला था, लेकिन वे बुढ़ापे के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें जीवन के सुखों का अनुभव करना था। इसलिए उन्होंने अपने बुढ़ापे के बदले अपने पुत्रों से उनका यौवन मांगा। ज्येष्ठ पुत्र यदु ने उन्हें मना कर दिया। उसके अनुसार, आखिर कोई युवक अपना भविष्य क्यों त्यागे, ताकि उसके पिता अपनी इच्छाएं पूरी कर सकें? यदु के तीन छोटे भाइयों ने भी मना कर दिया। केवल पुरु ने अपने पिता की बात मानी। वह बूढ़ा हो गया और ययाति को उनका यौवन वापस मिल गया। ययाति ने कई वर्षों तक यौवन का आनंद उठाया। अंततः उन्हें समझ में आया कि सिर्फ इच्छाओं को पूरा करके उन्हें तृप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने पुरु को उसका यौवन लौटाकर उसे राजा बना दिया। यदु को राजपद से वंचित रखा गया, जबकि उसने तो जीवन के स्वाभाविक चक्र का आदर किया था। यदु से यादव वंश चला, जिसमें कृष्ण का जन्म हुआ। वहीं, पुरु के राजवंश में कौरवों और पांडवों का जन्म हुआ। परंपरागत कथाओं में पुरु की पितृभक्ति की प्रशंसा की गई। लेकिन सच तो यह है कि ययाति अपने निजी सुखों के बारे में सोच रहे थे, न कि अपने राज्य या अगली पीढ़ी के बारे में। यह अधर्म है। अब रामायण की ओर मुड़ते हैं। वाट्सऐप जनरेशन कहेगी कि राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और इसलिए वे आदर्श पुत्र कहलाए। लेकिन राम ने वनवास इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे जानते थे कि राजा द्वारा दिए गए वचन का सम्मान करना आवश्यक है, भले ही उसे निभाना असुविधाजनक ही क्यों न हो। इसे मर्यादा कहते हैं। यह हमें सीमाओं तथा बंधनों का सम्मान करने और सत्यनिष्ठ तथा वचनबद्ध बनने के लिए प्रेरित करती है। यह माता-पिता की सनक का बिना सोचे-समझे पालन करने से बिल्कुल अलग है। राम ने वनवास स्वीकार करके ऐसे सिद्धांत को बनाए रखा, जो किसी एक व्यक्ति की इच्छा से बड़ा था। इसके विपरीत, ययाति ने अपनी इच्छा पूरी की और इसकी कीमत उनके पुत्रों को चुकानी पड़ी। संभव है कि धर्म के मार्ग पर चलने के लिए कुछ त्याग करने पड़ें, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि त्याग का हर कृत्य धर्मसम्मत ही हो। ययाति की पुत्री माधवी की भयंकर कहानी इस बात को और स्पष्ट करती है। ऋषि गालव को अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र को गुरु दक्षिणा के रूप में 800 अश्व देने थे। उन्होंने ययाति से मदद मांगी, लेकिन ययाति के पास इतने अश्व नहीं थे। इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री माधवी को ऋषि गालव को सौंप दिया। ऋषि गालव ने माधवी को तीन राजाओं के पास भेजा। प्रत्येक राजा ने माधवी से एक पुत्र प्राप्त किया और बदले में 200 अश्व दिए। माधवी ने विश्वामित्र के साथ भी एक पुत्र को जन्म दिया। इस तरह विश्वामित्र को अपने शिष्य से गुरु दक्षिणा मिल गई। चार पुरुषों को पुत्र मिले, गालव ने अपना ‘कर्तव्य’ निभाया और ययाति ने ‘पुण्य’ अर्जित किया। इन सभी के लिए माधवी का शरीर माध्यम बना। उसने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया, लेकिन यह धर्म नहीं, बल्कि शोषण था। इस विचलित कर देने वाली कहानी के माध्यम से व्यास हमें उन पिताओं के बारे में चेतावनी देते हैं, जो अपने बच्चों का शोषण करते हैं। इसलिए, जब वाट्सऐप जनरेशन स्नैपचैट जनरेशन से कहती है कि आज्ञापालन करना ही सनातन धर्म का पालन करना है तो शायद युवा पीढ़ी को उन्हें महाभारत और रामायण दोबारा पढ़ने की सलाह देनी चाहिए। और केवल वे पन्ने नहीं, जिनमें बच्चे अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं, बल्कि वे पन्ने भी जिनमें माता-पिता अपने बच्चों का शोषण करते हैं।
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