देवदत्त पट्टनायक25 मिनट पहले
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मध्य वियतनाम में स्थित शिवजी को समर्पित करीब 1500 वर्ष पुराने ‘माय सन’ मंदिर के अवशेष।
पांचवीं सदी में अर्थात करीब 1500 वर्ष पहले भारत में गुप्त राजवंश उभरा। गुप्त राज परिवार ऐसे पहले राज परिवारों में से एक था, जिसने हिंदू धर्म के ढांचे के आधार पर स्वयं को स्थापित किया था। गुप्त काल के बाद रोमन साम्राज्य का अंत होेने की वजह से रोम के साथ व्यापार अस्त-व्यस्त हो गया, लेकिन फिर यह भारत के पूर्वी समुद्रतट से दक्षिण-पूर्वी एशिया तक खूब पनपा। यहां अब वियतनाम और कंबोडिया राज्य हैं, जहां कभी चम्पा और खमेर हिंदू राज्यों का प्रभुत्व था।
चम्पा राज्य तीसरी से तेरहवीं सदियों तक अस्तित्व में था। वियतनाम के तटवर्ती भागों में हिंदू त्रिमूर्ति को समर्पित मंदिर पाए जाते हैं। दूसरी ओर कंबोडिया में कुछ अलग देखा जाता है। कंबोडिया के उत्तरी भीतरी भाग में कई शिवलिंग पाए गए हैं। कंबोडिया के दक्षिणी तटवर्ती भाग में विष्णु की अनेक मूर्तियां पाईं गईं। तपस्वियों और अप्सराओं की नक्काशी भी पाई गई है। इनसे स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों में हिंदू विचार पहुंचे थे। इन विचारों में सांसारिक और आध्यात्मिक जगत के बीच तनाव देखा जाता है।
इस प्रकार, स्पष्ट है कि 1500 वर्ष पहले हिंदू विचार भारत से बाहर दक्षिण-पूर्वी एशियाई राज्यों तक फैलकर उस क्षेत्र के सबसे दूरवर्ती भागों, जैसे वियतनाम और कंबोडिया पहुंचे थे।
शिवलिंग एक ज्यामितीय आकृति है। वहीं दूसरी ओर विष्णु की छवियां या मूर्तियां मानवीय दिखती हैं और उनमें चार भुजाएं होती हैं। शिवलिंग एक स्तंभ जैसे होता था, जो धरती में गाड़ा जाता था। प्रारंभिक शिवलिंगों की तुलना में बाद के शिवलिंग अधिक प्रतीकात्मक हैं: निचला भाग अष्टकोण के आकार का है और ऊपरी भाग गोलाकार है। इसके माध्यम से राजा उस शिवलिंग के पास के क्षेत्र पर अधिकार जमाते थे।
तटवर्ती भागों में विष्णु की मूर्तियों में उनकी भुजाएं शंख, चक्र और गदा धारण करती हैं। लेकिन चौथी भुजा में कमल के फूल के बजाय बहुधा एक गोलाकार वस्तु होती है। माना जाता है कि यह पृथ्वी या भूमि है।
विश्व के अन्य भागों से व्यापार करने के कारण कंबोडिया के तटवर्ती क्षेत्र उसके भीतरी क्षेत्रों से अधिक विकसित और परिष्कृत थे। उसके समुद्रतट पर विष्णु पाए जाते हैं। शिव कंबोडिया के वनीय एवं भीतरी भागों से जुड़े हैं। अधिक परिष्कृत विष्णु वस्त्र और आभूषण पहनते हैं। वहीं शिव खाल पहनते हैं। उन्हें केवल प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया जाता है। शिव हर हैं, वे जो अधिकार जमाते हैं। विष्णु हरि हैं, वे जिनसे लाभ होता है। इस प्रकार, राजा हर और हरि दोनों थे। पहले उन्होंने हर जैसे अधिकार जमाया अर्थात उन्होंने वश में किया और फिर हरि की तरह उन्होंने प्रजा को समृद्ध बनाया।
ये छवियां यहां तक पहुंचीं कैसे? पारंपरिक समझ यह है कि सदियों से भारत के पूर्वी समुद्रतट से दक्षिण-पूर्वी एशिया तक यात्रा करने वाले समुद्री व्यापारी उन्हें वहां ले गए थे। दक्षिण-पूर्वी एशिया में भारतीय वस्त्रों की बड़ी मांग थी। दूसरी ओर दक्षिण-पूर्वी मसालों की भारत में नहीं, बल्कि उसके पार रोम में बड़ी मांग थी। लेकिन अधिकांश व्यापारी बौद्धधर्मीय थे। यह स्पष्ट है कि म्यांमार, थाईलैंड और श्रीलंका में बौद्ध धर्म उनके कारण फैला। लेकिन इन देशों के पार, वियतनाम और कंबोडिया में हिंदू धर्म फैला। इसका श्रेय पाशुपत शैव नामक विशेष समुदाय को जाता है।
यह समुदाय एक अलग प्रकार की तपश्चर्या करता था। वे जीवन को त्यागने में नहीं, बल्कि तपश्चर्या से प्राप्त आध्यात्मिक सिद्ध शक्ति को इकट्ठा कर उसे प्रसारित करने में विश्वास रखते थे। इस प्रकार, देवताओं की यह शक्ति आध्यात्मिक संसार से मनुष्यों के संसार तक लाई जा सकती थी। वह साधारण मनुष्य को राजा बनाकर समृद्ध, सुरक्षित और सुखी राज्य स्थापित करने में मदद कर सकती थी। इस समुदाय ने राजा के माध्यम से दैवी और मानवीय संसारों को जोड़ दिया। स्वभावतः, राजा बनने के इच्छुक शक्तिशाली सरदारों ने उन्हें आमंत्रित किया।
पाशुपत शैवों के साथ पंचरात्र भागवत समाज भी इस क्षेत्र में आया। ये ऋषि थे, जो शिव को नहीं बल्कि विष्णु को उनके कृष्ण रूप में पूजते थे। शिव और विष्णु की विश्वदृष्टि बहुत अलग है। शिव अधिक कठोर जीवन जीते हैं, जबकि विष्णु अधिक सांसारिक जीवन। शिव बल से जुड़े हैं, जबकि विष्णु कूटनीति से।
अगले सप्ताह के लेख में हम जानेंगे कि कैसे इन दो विश्वदृष्टियों ने दो प्रकार के राजत्वों को जन्म दिया और कैसे उसके बाद उन विश्वदृष्टियों का मिलन हुआ।








