रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  साजिद नाडियाडवाला: जब 22 साल की उम्र में ही खड़ी कर ली थी बड़ी स्टारकास्ट
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: साजिद नाडियाडवाला: जब 22 साल की उम्र में ही खड़ी कर ली थी बड़ी स्टारकास्ट

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रूमी जाफरी6 घंटे पहले

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आज मैं उस शख्स के बारे में लिखने जा रहा हूं, जो दोस्त के रूप में भाई और भाई की शक्ल में दोस्त है। 18 फरवरी को उसकी सालगिरह है। वो शख्स है साजिद नाडियाडवाला।

जिस दिन से साजिद ने अपने चाचा के यहां से काम छोड़कर प्रोड्यूसर बनने का इरादा किया, उसी दिन से वो मेरा दोस्त है। भाई कहना ठीक रहेगा, क्योंकि उसकी अम्मी ने भी मुझे अपना बेटा माना है। उन्होंने मुझे मां का प्यार दिया है। उसकी बहन मेरी बहन बन गई, उसके मामू मेरे मामू बन गए, उसके नाना-नानी मेरे भी नाना-नानी बन गए। मतलब साजिद के साथ मुझे पूरा परिवार मिल गया, जो मैं बम्बई आकर मिस करता था। तकरीबन 6-7 साल तक तो हम दोनों चौबीसों घंटे साथ रहे हैं। फिल्मों, कहानियों, करैक्टर, शायरी यही सब डिस्कशन होते थे। कई-कई बार तो हम दो-दो तीन-तीन दिन तक घर से निकलते नहीं थे, लेकिन कभी एक-दूसरे की कंपनी से बोर नहीं होते थे।

इंडस्ट्री में अपने दादा और अपने डैडी की वजह से और नाडियाडवाला सरनेम की वजह से साजिद की बहुत इज्जत रही। मगर साजिद ने इंडस्ट्री में अपना मुकाम अपने दम पर बनाने की ठान ली थी। उसने ये सोच लिया था कि मैं बिना किसी रिश्तेदारों की मदद के इंडस्ट्री में जगह बनाऊंगा। उसकी सोच शुरू से ही बहुत बड़ी थी। 21-22 साल की उम्र में उसने उस वक्त की सबसे बड़ी स्टारकास्ट खड़ी कर ली थी। धरम जी बहुत बड़े स्टार थे, बहुत बिजी भी थे, लेकिन उन्होंने उन्हें साइन किया। गोविंदा से तो उस समय मिलना तक मुश्किल काम था, मगर उन्हें भी साइन कर लिया। किमी काटकर, मौसमी चटर्जी, परेश रावल, अर्चना पूरन सिंह, रजा मुराद, शक्ति कपूर, नीना गुप्ता सहित तकरीबन 25 लोग उस समय के बड़े तथा व्यस्त एक्टरों में शामिल थे। उस फिल्म का नाम था ‘जुल्म की हुकूमत’। फिल्म में वॉइस ओवर भी अमिताभ बच्चन जी से करवाया गया था।

हमने इतना लंबा सफर मिलकर तय किया है कि केवल एक कॉलम में तो उसके बारे में नहीं लिखा जा सकता। उससे जुड़े बहुत सारे किस्से हैं। आज एक किस्सा बताता हूं। उस वक्त हमारे फाकामस्ती के दिन चल रहे थे। हम लोगों को बहुत भूख लगी और हम होटल हॉलिडे इन में पहुंच गए। खाने का अॉर्डर किया। साजिद बोला कि बिल तुझे देना पड़ेगा, क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं हैं। मैंने कहा कि तुझे देना पड़ेगा, पैसे मेरे पास भी नहीं हैं। साजिद को लगा कि मैं झूठ बोल रहा हूं और मुझे लगा कि साजिद झूठ बोल रहा है। खाना आ गया और दोनों ने खा भी लिया। फिर बिल आया तो पता लगा कि हम दोनों ही सच बोल रहे थे। हम दोनों की जेबें खाली थीं, दोनों के पास पैसे नहीं थे। दोनों इसी सोच में बैठ गए कि अब क्या करें, वेटर सामने आकर खड़ा हो गया तो हमने पूछा कि मीठे में क्या है? उसने बताया और हमने मीठे का ऑर्डर भी कर दिया। टाइम पास करने में बिल और बड़ा हो गया। उस वक्त मोबाइल तो थे नहीं। खैर, साजिद ने होटल के फोन से अपने एक और दोस्त को फोन किया। किस्मत से वो मिल गया और उसके पास पैसे भी थे। वो पैसे लेकर होटल हॉलिडे इन में आया। उसके इंतजार में हमने कॉफी भी आर्डर कर दी। उसने आकर फिर बिल चुकाया, तब हम वहां से निकलकर घर गए। और आज उसी साजिद से कितने लोगों की रोजी-रोटी चलती है, उनका घर चलता है। ये साजिद की अपने दम पर, अपनी काबिलियत पर कमाया हुआ नाम है। आज उसकी गिनती फिल्म इंडस्ट्री के सबसे शीर्ष प्रोड्यूसरों में होती है। इसी बात पर मुझे मजरूह सुल्तानपुरी का एक शेर याद आ रहा है:

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।

एक बार साजिद ने एक नई कार खरीदी। तो हमने सोचा कि रोड ट्रिप पर चला जाए। उस कार में बैठकर साजिद और मैं यहां से साजिद के ददिहाल नाडियाड गए। फिर साजिद के गांव से निकलकर हम उदयपुर, जयपुर, अजमेर और दिल्ली गए। मुंबई से निकलने से पहले ही हमने सोच लिया था कि रास्ते में किसी थ्री स्टार, फाइव स्टार होटल टाइप के होटलों मंे चेक इन नहीं करेंगे। ढाबों पर खाएंगे और ढाबों की खटिया पर सोएंगे। बहुत ही यादगार ट्रिप रही। हम लोग जयपुर पहुंचे। वहां रुककर एक होटल में तैयार हुए और वहां से अजमेर गए। अजमेर से हम दिल्ली रवाना हुए। फिर वहीं रास्ते में ढाबे पर रुके और खटिया पर सोए। जब हम दिल्ली होटल हॉलिडे इन पहुंचे तो हमें देखकर लोगों का अजीब रिएक्शन था। तब हमें समझ में आया कि इतने लंबे सफर में हमारे कपड़े, हमारी शक्ल और हमारे बाल जिस तरह के हो गए थे, तो लोगों को लगा होगा कि ये फाइव स्टार होटल में कैसे आ सकते हैं। हम लॉबी में बैठ गए। जब हम बैठे तो लॉबी का स्टॉफ ऐसे देख रहा था कि ये बैठ क्यों गए। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब हम सोफे से उठकर रिसेप्शन पर रूम लेने गए तो स्टॉफ ने सोफे को कपड़े से साफ करना शुरू कर दिया था।

खैर, ऐसे खट्टे मीठे बहुत सारे किस्से हैं साजिद और मेरे, जो मैं कभी इस कॉलम में या अपनी जीवनी में लिखूंगा। आज साजिद को याद करते हुए उसकी सालगिरह की बहुत मुबारकबाद देते हुए और उसके लिए दुआएं करते हुए कि आने वाले समय में वो बहुत सारी अच्छी फिल्में बनाएं और पूरी दुनिया को एंटरटेन करें, उसकी फिल्म ‘2 स्टेट्स’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए :

मन मस्त मगन मन मस्त मगन बस तेरा नाम दोहराए…



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