रसरंग में मायथोलॉजी:  पुरी से महाभारत तक, ऐसी है नागार्जुन की यह अनकही कथा
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रसरंग में मायथोलॉजी: पुरी से महाभारत तक, ऐसी है नागार्जुन की यह अनकही कथा

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जब भी कोई नागार्जुन का उल्लेख करता है, तब अधिकांश लोगों के दिमाग में उसी नाम के लोकप्रिय तेलुगु अभिनेता की छवि घूमने लगती है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि महाभारत से जुड़ी लोककथाओं में भी नागार्जुन नाम का एक पात्र है। यह अर्जुन का पुत्र है, जो एक गेंडे को बचाने के लिए स्वयं अपने पिता से भिड़ गया था। इसके अलावा, पुरी के जगन्नाथ मंदिर में परशुराम से जुड़ा एक पहनावा भी नागार्जुन कहलाता है। आइए, अगले दो लेखों में नागार्जुन के बारे में विस्तार से जानते हैं। शुरुआत पुरी के जगन्नाथ मंदिर से करते हैं। यहां जगन्नाथ और बलभद्र की मूर्तियों को कभी-कभी योद्धाओं जैसी एक विशेष पोशाक पहनाई जाती है, जिसे ‘नागार्जुन’ कहा जाता है। इस पोशाक में दोनों देवताओं की दाढ़ी होती है और वे अनेक शस्त्र धारण किए होते हैं। यह मान्यता है कि जगन्नाथ भगवान विष्णु के एक रूप हैं। नागार्जुन पोशाक में उन्हें परशुराम का मूर्त रूप माना जाता है, जिन्होंने सहस्त्रबाहु राजा कार्तवीर्य अर्जुन से लड़कर दिव्य गाय कामधेनु और उसकी बछड़ी नंदिनी की रक्षा की थी। बलभद्र या बलराम को शिवजी का रूप माना जाता है। महाभारत में वर्णन मिलता है कि शिवजी ने किरात जनजाति के एक युवक का रूप लेकर अर्जुन को चुनौती दी थी। यह घटना उस समय की है, जब पांडव वनवास में थे और अर्जुन इंद्रदेव को प्रसन्न कर दिव्य शस्त्र प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे। जब अर्जुन ध्यान में लीन थे, तभी एक जंगली वराह उनकी ओर दौड़ा। जब उन्हें इसका आभास हुआ तो उन्होंने आंखें खोलकर बाण से उसका वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने वराह के शरीर में एक और बाण को धंसा हुआ पाया, जो एक किरात शिकारी ने मारा था। जब उस शिकारी ने वराह पर अपना अधिकार जताया तो अर्जुन क्रोधित हो गए और उसे द्वंद्व युद्ध की चुनौती दे डाली। लंबे द्वंद्व युद्ध के बाद भी अर्जुन उस शिकारी को पराजित नहीं कर सके। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि स्वयं शिवजी शिकारी का रूप धारण करके उनसे लड़ रहे हैं। यह जानकर अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किया। शिवजी भी प्रसन्न होकर अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए और उन्होंने अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान किया। उन्होंने यह भी बताया कि वह वराह वास्तव में इंद्रदेव थे। इसके बाद इंद्रदेव ने भी अर्जुन की इच्छा पूरी करते हुए उन्हें कई दिव्य अस्त्र प्रदान किए। इस प्रकार हम पाते हैं कि जगन्नाथ और बलभद्र दोनों ने पथभ्रष्ट योद्धाओं को धर्म के मार्ग पर लाने का प्रयास किया। अर्जुन ने विनम्रता से किरात की बात स्वीकार कर ली, जबकि कार्तवीर्य अर्जुन ने परशुराम की बात नहीं मानी और परिणामस्वरूप उनका वध हुआ। राजाओं को यह स्मरण दिलाने के लिए कि उन्हें अपने शासन में सदैव धर्म का पालन करना चाहिए, पुरी में हर वर्ष नवरात्रि के समय नागार्जुन की विशाल मूर्तियां जुलूसों में निकाली जाती हैं। इस पर्व के दौरान राजाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे दुर्गा का आवाहन करें, शस्त्रों की पूजा करें और धर्म के पालनकर्ता के रूप में अपनी भूमिका की पुनः पुष्टि करें। 15वीं सदी में सारला दास नामक ओड़िया कवि ने महाभारत का रचनात्मक पुनर्कथन किया था, जो इस महाकाव्य के प्रारंभिक क्षेत्रीय संस्करणों में से एक है। इसमें नागार्जुन का एक अलग ही रूप सामने आता है। कुंती ने पांडवों से कहा कि उनके पिता की आत्मा स्वर्ग नहीं पहुंच सकी, क्योंकि उनका अंतिम संस्कार उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं हो पाया था। उस संस्कार में गेंडे का उपयोग आवश्यक था, जो नहीं हो सका था। इसलिए पांडव गेंडे की खोज में निकल पड़े। अर्जुन को शिव के बाग में एक गेंडा दिखाई दिया। वे उसे पकड़ने ही वाले थे कि एक अन्य योद्धा ने उन्हें चुनौती दी। इसके बाद हुए युद्ध में अर्जुन पराजित हो गए। तब उस योद्धा की मां, जो एक नाग कन्या थी, वहां आई और उसने अपने पुत्र से कहा कि अर्जुन ही उसके पिता हैं। इस प्रकार अर्जुन और उनके पुत्र का मिलन हुआ। चूंकि वह पुत्र अर्जुन और नाग कन्या से उत्पन्न हुआ था, इसी कारण वह नाग-अर्जुन (नागार्जुन) कहलाया। अगले सप्ताह हम नागार्जुन से जुड़ी कुछ और लोककथाओं के बारे में जानेंगे।



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