देवदत्त पट्टनायक5 घंटे पहले
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भगवान शिव को समर्पित तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर।
कुछ वर्ष पहले मणिरत्नम ने चोल साम्राज्य पर आधारित ‘पोन्नियिन सेलवन’ नामक दो फिल्में बनाई थीं। भव्य सेट, प्रभावशाली दृश्य और समीक्षकों की प्रशंसा के बावजूद अधिकांश गैर-तमिल दर्शक उनसे जुड़ नहीं पाए। कारण सरल था – वे चोलों के गौरवशाली इतिहास से अपरिचित थे। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि कल्कि नामक लेखक ने चोलों पर प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास लिखे थे, जिन पर ये फिल्में आधारित थीं। इसलिए दर्शकों का फिल्म से भावनात्मक जुड़ाव बहुत कम रहा। वास्तव में चोल राजवंश ने भारतीय धार्मिक और स्थापत्य इतिहास में एक ऐसी भूमिका निभाई जिसने हिंदू मंदिरों की परंपरा को नया अर्थ और नई ऊंचाई दी। उन्होंने मंदिरों को न केवल आस्था का केंद्र बनाया, बल्कि उन्हें राजसत्ता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक भी बना दिया। लगभग 1500 वर्ष पहले प्रारंभिक हिंदू मंदिर राजाओं द्वारा नहीं बनाए गए थे। ये मंदिर अधिकतर बौद्ध स्तूपों की भांति ईंटों के बने छोटे ढांचे थे, जैसे 5वीं सदी में कानपुर के निकट भीतरगांव का मंदिर। तब उनका उद्देश्य बौद्ध स्थापत्य की बराबरी करना था। धीरे-धीरे जब हिंदू राजवंशों का उदय हुआ तो देवताओं की मूर्तियां पत्थर की गुफाओं में उकेरी जाने लगीं, जैसे गुप्तकालीन उदयगिरि की गुफाएं, कलचुरीकालीन एलीफैंटा की गुफाएं और चालुक्यकालीन बादामी के शैलमंदिर। प्रारंभिक मंदिरों की छतें सपाट हुआ करती थीं। फिर 7वीं सदी में तमिल क्षेत्र के पल्लवों ने महाबलीपुरम में और 8वीं सदी में राष्ट्रकूटों ने एलोरा में अखंड चट्टानों से अद्भुत मंदिर बनवाए। एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर और महाबलीपुरम के तट-मंदिर इस विकास के साक्षी हैं। इन्हीं कालों में मंदिरों के छतों को विशेष नाम मिले, जैसे उत्तर भारत में शिखर और दक्षिण भारत में विमान। 10वीं सदी आते-आते दक्षिण भारत में चोल राजवंश का उदय हुआ। राजाराज चोल प्रथम के शासनकाल में साम्राज्य और संस्कृति दोनों का स्वर्ण युग प्रारंभ हुआ। उन्होंने दक्षिण में पांड्य और पश्चिम में चालुक्य राजाओं को पराजित कर अपनी सीमाएं बंगाल की खाड़ी तक फैला दीं। आंध्र और ओडिशा के समुद्रतटीय क्षेत्रों से होते हुए उन्होंने गंगा के मुहाने तक अपना अधिकार स्थापित किया। किंवदंती है कि उन्होंने वहां से भैरव की मूर्तियां लूटकर अपने दक्षिणी मंदिरों में प्रतिष्ठित कीं। राजाराज चोल का सबसे बड़ा योगदान स्थापत्य के क्षेत्र में था तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर। यह उस युग का सबसे भव्य मंदिर था। 200 फुट से अधिक ऊंचे उसके पिरामिडनुमा विमान ने द्रविड़ स्थापत्य की परंपरा को एक नया आयाम दिया। इस मंदिर में प्रतिष्ठित शिव को राजाराजेश्वर कहा गया, क्योंकि यह मंदिर स्वयं राजा ने बनवाया था। इस नाम से यह भी स्पष्ट था कि राजा को शिव का रूप माना जाता था। वह केवल शासक नहीं, देवत्व का प्रतीक भी था। चोलों ने शिव को अपना आराध्य बनाया। उन्होंने उस स्थान पर शिव मंदिर बनवाने की परंपरा आरंभ की, जहां किसी राजा का दाह संस्कार हुआ हो। इस प्रकार राजा और देवता के बीच एक आत्मिक संबंध निर्मित हुआ। यह व्यवस्था राजसत्ता को धार्मिक वैधता देती थी, विशेषकर 10वीं से 12वीं सदियों के बीच। गुप्त राजाओं के लिए विष्णु सबसे प्रमुख देवता थे। इसलिए उन्होंने मध्य भारत के पहाड़ों में विष्णु के वराह अवतार की विशाल प्रतिमाएं बनवाई थीं। लेकिन चोलों ने शिव को सर्वोच्च देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया और अपने विशाल मंदिरों के माध्यम से यह दिखाया कि वे अपने पूर्ववर्ती राजवंशों से अधिक शक्तिशाली और धार्मिक रूप से श्रेष्ठ हैं। राजाराज चोल के उत्तराधिकारियों ने भी इस परंपरा को जारी रखा। उनके पुत्र और पौत्रों ने इससे भी ऊंचे, भव्य और सुसज्जित मंदिर बनवाने की प्रतिस्पर्धा की। ओडिशा के अनंतवर्मन चोडगंगदेव ने तंजावुर के बृहदेश्वर से ऊंचा मंदिर बनाने के उद्देश्य से पुरी का जगन्नाथ मंदिर बनवाया। जब उसका शिखर थोड़ा छोटा निकला तो उन्होंने उस पर धातु का विशाल चक्र रखवाकर उसे ऊंचाई में आगे कर दिया। मालवा के परमार राजा भोज ने भोपाल में शिव को समर्पित भव्य मंदिर का निर्माण प्रारंभ किया, जिसमें सात फुट ऊंचा शिवलिंग स्थापित होना था, पर मंदिर अधूरा रह गया। संभवतः किसी प्राकृतिक आपदा, वास्तु दोष या राजनीतिक पराजय के कारण। खजुराहो के मंदिर भी इसी तरह की राजसी प्रतिस्पर्धा और स्थापत्य महत्वाकांक्षा के प्रतीक हैं। पत्थरों के भव्य मंदिरों को राजसत्ता का प्रतीक बनाने का श्रेय निस्संदेह चोलों को जाता है। उन्होंने लकड़ी और ईंटों के सीमित ढांचों को पीछे छोड़ते हुए विशालकाय मंदिरों की परंपरा शुरू की। बृहदेश्वर का ऊंचा, गगनचुंबी विमान मीलों दूर से दिखाई देता था। दक्षिण भारत के मंदिरों के ऊंचे गोपुरम भी चोलों की ही देन हैं। बाद के राजाओं ने इन्हें और ऊंचा और अलंकृत बनाकर स्थापत्य प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाया। इतिहासकारों के अनुसार वैदिक परंपरा में मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं मिलता, जबकि राष्ट्रवादी इस बात का प्रचार करते हैं कि हिंदू मंदिर वैदिक काल से रहे हैं। रूढ़िवादी ब्राह्मण समुदाय वैदिक यज्ञों को प्राथमिकता देता था। मंदिरों का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में 12वीं सदी के बाद ही प्रमुखता से मिलता है। यह वही काल है, जब उत्तर भारत में मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई जा रही थीं। संभवतः यह संयोग नहीं कि चोलों ने उसी सदी में इतने भव्य मंदिर बनवाए। चोलों के मंदिरों में तीन प्रमुख शिवालय आज यूनेस्को विश्व धरोहर हैं- तंजावुर का बृहदेश्वर, गंगईकोंड चोलपुरम और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर। लकड़ी और ईंटों के महलों की तुलना में पत्थर के बने ये मंदिर आज भी स्थायित्व का प्रतीक हैं। चिदंबरम का नटराज मंदिर उन प्राचीनतम सक्रिय मंदिरों में है, जो नर्तकों के लिए महत्वपूर्ण है।








