देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

यक्षिनी ‘अंबिका’ की प्रतिमा, जिन्हें हिंदू देवी दुर्गा या पार्वती से जोड़कर देखा जाता है।
जैन धर्म मठवासी धर्म है। इतिहासकारों के अनुसार उसका उद्गम लगभग 2,500 वर्ष पहले हुआ और उसके अधिकांश धर्मग्रंथ 1,500 वर्ष पहले रचे गए। लेकिन उसके आख्यानशास्त्र (मायथोलॉजी) के अनुसार वह एक सनातन धर्म है, अर्थात वह अनादि और अनंत है। उसके अनुसार समय के अनगिनत कालचक्र होते हैं और प्रत्येक कालचक्र में 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती और 9 वासुदेव धरती पर जन्म लेकर जैन धर्म का प्रचार करते हैं। जैन धर्म पर बात करते समय बहुधा तीर्थंकरों के पुरुष और महिला सेवकों अर्थात यक्ष और यक्षियों का उल्लेख करना रह जाता है। महिला यक्षों को यक्षिनी भी कहा जाता है। चौबीस तीर्थंकर होने के कारण विस्तृत जैन देवगण में कुल चौबीस यक्ष और चौबीस यक्षियां भी होती हैं।
जैन विश्व दो समूहों में बंटा हुआ था। श्रमण वे साधु थे, जिन्होंने भूख को वश में करना चाहा। उनके लिए तीर्थंकर आदर्श थे, जिन्होंने भूख सहित अन्य सभी कुछ त्याग दिया था। दूसरी ओर, श्रावक इन श्रमणों का समर्थन करते थे। वे सामान्य व्यवसायी थे और उनकी सादी, सांसारिक आवश्यकताएं थीं।तीर्थंकरों को पूजने के साथ-साथ ये श्रावक क्षेत्रीय देवी-देवताओं को भी पूजते थे। ये देवी-देवता पहाड़ों, पेड़ों, चट्टानों और नदियों से जुड़े होते थे। समय के साथ वे तीर्थंकरों के साथ जोड़े जाने वाले यक्ष और यक्षी बन गए। इस प्रकार सामान्य लोगों का देशज धर्म जैन मठवासी संप्रदाय के मार्गी धर्म से जुड़ गया।
यक्ष और यक्षियां प्राचीन क्षेत्रीय देवी-देवता थे, जो परोपकारी और द्वेषपूर्ण दोनों थे। ऐसी कई कहानियां मिली हैं जिनमें यक्ष और यक्षियों ने साधुओं और ऋषियों को कष्ट पहुंचाए। कुछ को दूर भगाया गया तो कुछ को वश में कर लिया गया और कुछ को मनाया गया जिससे वे जैन साधुओं की सेवा करने लगे। इसके बाद साधु और उनका धर्म लोकप्रिय बन गए। संभवतः इससे लोग तीर्थंकरों और उनके साथ यक्ष और यक्षियों को पूजने के लिए प्रेरित हुए।
कुछ जैन यक्षियां या यक्षिणियां हिंदू देवियों से मिलती-जुलती हैं। उदाहरणार्थ, बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ की यक्षिनी ‘अंबिका’ दुर्गा की तरह शेर पर सवार होती हैं। अंबिका को अंबाई, अंबा और कुष्मण्डिनी भी कहा जाता है। वे बच्चों से जुड़ी हैं और इसलिए हम उन्हें पार्वती से जोड़ सकते हैं। अंबिका को समर्पित कई मंदिर और उनकी कई मूर्तियां भारत भर में पाई जाती हैं। कुष्मण्डिनी देवी की पूजा कर्नाटक में श्रवणबेलगोल के अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण भाग है।
तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की यक्षिनी ‘पद्मावती’ नागों और कमल के फूल से जुड़ी हैं। इसलिए हम उन्हें लक्ष्मी और गोवा में प्रसिद्ध सतावई और ब्राह्मणी जैसी धरती की देवियों से जोड़ सकते हैं। अंबिका की तरह पद्मावती को भी पूजा जाता है। वास्तव में दोनों तांत्रिक अनुष्ठानों से जुड़ी हैं। भैरव-पद्मावती-कल्प पद्मावती के सम्मान में मल्लीसेन द्वारा 12वीं सदी में लिखा तांत्रिक ग्रंथ है। इस कालचक्र में पहले तीर्थंकर ‘ऋषभनाथ’ चक्रेश्वरी से जुड़े हैं। वे देवी जो कृष्ण की तरह चक्र धारण करती हैं। विद्या की देवी सरस्वती का जैन चित्रकारी में प्रमुख स्थान है, क्योंकि वे ऋषियों के ज्ञान का मूर्त रूप हैं। उनकी सबसे प्राचीन प्रतिमा मथुरा में सन 100 सीई तक कालांकित जैन पुरातत्व स्थल में पाई गई है। जैन धर्म के अधिक कठोर दिगंबर संप्रदाय में सरस्वती मोर के साथ जुड़ी हैं। श्वेतांबर संप्रदाय में वे हंस से जुड़ी हैं। उन्हें संगीत, कला, लेखन और लिपियों से जोड़ा जाता है। उन्हें श्रुति देवी (वाणी की देवी) के नाम से भी जाना जाता है। संभवतः इससे पहले कि सरस्वती हिंदू देवगण की महत्वपूर्ण देवी बन गईं, उनका चित्रीकरण जैन देवगण में और लोकप्रिय था।
एक और यक्षिनी जो विशेषकर दक्षिण भारत में लोकप्रिय बनीं, वे थीं ज्वालामालिनी। उनकी माला अग्नि से बनी होती थी। वे 750 सीई और 1,000 सीई के बीच कर्नाटक में राष्ट्रकूट युग में प्रसिद्ध थीं। वे आठवें तीर्थंकर ‘चंद्रप्रभा’ से जुड़ी हैं। जैन आचार्य इंद्रनंदी ने उनके सम्मान में दसवीं सदी में कर्नाटक में ज्वालामालिनी कल्प रचा। इन देवियों का आवाहन समृद्धि और सुरक्षा के लिए किया जाता है। बहुधा उनकी कई भुजाएं होती हैं। उनके माध्यम से हम देख सकते हैं कि कैसे न केवल जैन देवगण में, बल्कि महायान बौद्ध धर्म और पौराणिक हिंदू देवगणों में देवियों का महत्व बढ़ रहा था।








