रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  जब अन्नू कपूर के नाटक ‘लैला मजनू’ के लिए जुट गए थे 2 हजार दर्शक
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: जब अन्नू कपूर के नाटक ‘लैला मजनू’ के लिए जुट गए थे 2 हजार दर्शक

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आने वाली 20 फरवरी को मुंबई में मेरे सबसे पुराने, सबसे करीबी और दोस्त से भी बढ़कर भाई समान अन्नू कपूर का जन्मदिन है। तो इस बार मेरे हिस्से के किस्से में आज बात अन्नू भाई की।
साल 1986 में उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी। मैं तब सिर्फ 20 साल का था। हमने मिलकर एक थिएटर ग्रुप बनाया, जिसका नाम रखा ‘कुटुंब’। पहला प्ले किया ‘लैला मजनू’। ये पारसी थिएटर का प्ले था, जिसमें संवाद शेर-ओ-शायरी में होते हैं और वो भी बहुत खालिस अदबी उर्दू में। यह प्ले अन्नू भाई ने अपने पिता की कंपनी में बचपन से देखा और किया है। तो यह इसे भी डायरेक्ट अन्नू भाई ही कर रहे थे। लोगों ने बहुत समझाया कि बॉम्बे में हिंदी प्ले उतने नहीं चलते, जितने मराठी, गुजराती और इंग्लिश चलते हैं और तुम उर्दू प्ले करने चले हो। तो अन्नू भाई ने कहा कि हम पैसे कमाने के लिए यह प्ले नहीं कर रहे। हम थिएटर की सेवा करने के लिए आए हैं। हमारा प्ले चार जहीन लोग भी देख लें और इसकी बात करें, तो हम समझेंगे कि हमारा थिएटर करना कामयाब हो गया।
उस वक्त अन्नू भाई फिल्मों में अपनी जगह बना चुके थे। तो हमारे ग्रुप में वही एक स्टार थे, जिनकी वजह से हमें स्पांसर वगैरह मिलने की उम्मीद थी। दो चार एक्टर भी होते हैं तो लोग बंबई में प्ले करने से डरते हैं, क्योंकि पैसे नहीं हैं तो एक्टर फ्री में आकर काम नहीं करते। और हमारे लैला मजनू में तो कम से कम 30-35 एक्टर थे। इतना तामझाम, म्यूजिशियन और इतने कॉस्ट्यूम थे।
हमारे शनिवार और रविवार के पहले शो तकरीबन खाली गए, लेकिन कोई मायूस नहीं हुआ। पर प्ले की जो जुबानी तारीफ हुई तो धीरे-धीरे वो इतना बड़ा हिट हो गया कि पृथ्वी थिएटर के बाहर 2 हजार दर्शक देखने जमा हो गए, जबकि इसकी क्षमता सिर्फ 220 लोगों की है। लोगों ने धक्का देकर वहां लगा लकड़ी का दरवाजा तोड़ दिया था। मुझे अभी भी याद है कि पृथ्वी थिएटर के मैनेजर वाडिया जी ने कहा था- ‘पहली बार मुझे थिएटर का नुकसान होने पर खुशी हुई है।’ आज पृथ्वी थिएटर में लोहे का दरवाजा लगा है और वो लैला मजनू प्ले के दौरान लकड़ी का दरवाजा टूटने के बाद ही लगा था।
पृथ्वी फेस्टिवल में हर साल एक फेस्टिवल होता है। उसमें प्ले करना बहुत इज्जत की बात मानी जाती है। शशि कपूर जी ने हमें बुलाया। कहा कि पृथ्वीराज कपूर पारसी थिएटर करते थे और मैं चाहता हूं कि पृथ्वी फेस्टिवल की ओपनिंग लैला मजनू से हो। उस वक्त फेस्टिवल में प्ले करने के 1500 रुपए दिए जाते थे। अन्नू भाई ने मना कर दिया कि हमारा प्ले 1500 रुपए में नहीं हो सकता, कम से कम 5000 रुपए चाहिए। अंतत: शशि कपूर जी ने 5000 रुपए दिए। तो 1 नवंबर 1987 को पृथ्वी फेस्टिवल की ओपनिंग लैला मजनू से हुई।
इसी बात पर मुझे कैसर उल जाफरी का एक शेर याद आ रहा है –

फनकार ये भी सोचें फन बेचने से पहले मिट्टी की मूर्ति पर सोने के दाम लिखें

हमारे प्ले में एक और दिक्कत यह थी कि एक्टर नहीं मिल रहा था। हमें ऐसा एक्टर चाहिए था जो एक्टिंग भी कर लें और साथ में गाने भी गा लें। डायलॉग पूरे पोएट्री में होते थे। ये आधे पोएट्री में बोलने पड़ते थे और आधे गाकर बोलने पड़ते थे। तब अन्नू भाई को डायरेक्शन के साथ-साथ मजनू का रोल भी करना पड़ा। वो उनकी यादगार परफॉर्मेंस थी। इस प्ले में मैंने अन्नू भाई से बहुत कुछ सीखा। उनके रूप में मुझे भाई तो मिला, साथ में पूरा परिवार मिला। मम्मी, बहन सीमा कपूर, भाई रणजीत कपूर, निखिल कपूर।

इस रिश्ते को भी अब 40 साल हो गए, लेकिन मोहब्बत में कोई कमी नहीं आई है। इसकी शिद्दत, इसकी गरमाहट और बढ़ी है। उदाहरण के लिए, मेरे छोटे भाई की शादी भोपाल में थी। तो अन्नू भाई खुद से अपना टिकट लेकर, अपनी गाड़ी लेकर और होटल बुक करके पहुंचे। मैंने टिकट वगैरह के लिए पूछा तो मुझे डांट दिया और बोले कि तू मेरा छोटा भाई है। घर की शादी में आने के लिए मैं तुझसे टिकट और होटल के पैसे लूंगा? बल्कि तुझे कुछ काम हो, कुछ चाहिए हो तो मुझे बताना। बाद में मेरी बहन के बेटे की शादी थी। तो उसमें सीमा कपूर, जिन्हें मैं प्यार से गुड्डो बाजी कहता हूं, भोपाल पहुंची थीं।
इस 20 तारीख को अन्नू भाई 70 साल के हो जाएंगे। खुदा नजर से बचाएं, लेकिन उनकी एनर्जी, उनकी याददाश्त 20 साल के लड़के जैसी है। मेरी दिल से दुआ है कि वो हमेशा ऐसे ही रहें और हमारा रिश्ता भी ऐसा ही बना रहे। इन्हीं दुआओं के साथ उनके द्वारा गाई और उन्हीं पर फिल्माई गई ‘हमारे बारह’ मूवी की कव्वाली सुनिए, अपना खयाल रखिए, खुश रहिए।
मुस्तफा मुस्तफा…



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