रूमी जाफरी10 घंटे पहले
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पिछले दिनों अनिल कपूर, जिन्हें मैं प्यार और अदब से कपूर साहब कहता हूं, दूसरी बार दादा बने। मैंने उन्हें मुबारकबाद देने के लिए फोन किया। फोन रखने के बाद मैं उनके बारे में सोचने बैठा तो आंखों के सामने उनका पूरा फिल्मी सफर, उनके परफॉर्मेंस और उनके अवॉर्ड्स जैसे एक-एक करके गुजरने लगे।
अभी हाल ही में मैंने उनकी फिल्म ‘सूबेदार’ देखी। उसी समय यह ख्याल आया कि इस उम्र में भी जिस ईमानदारी और शिद्दत के साथ उन्होंने एक्शन रोल निभाया है, वह अपने आप में एक मिसाल है, एक यादगार परफॉर्मेंस है। जब भी इंडस्ट्री और मीडिया अभिनय की बात करते हैं, तो अनुशासन, समर्पण और परफॉर्मेंस को लेकर अक्सर दिलीप कुमार साहब और अमिताभ बच्चन जी के उदाहरण दिए जाते हैं। लेकिन इतने वर्षों तक अनिल कपूर के काम को देखने के बाद मुझे लगता है कि इन दोनों महान कलाकारों के साथ अनिल कपूर साहब का नाम भी जोड़ दिया जाना चाहिए।
वो कहावत है ना कि पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। कपूर साहब को बचपन से ही एक्टिंग का शौक था। वे बचपन से ही मेहनती और परफेक्शन के प्रति सजग थे। शायद तब उन्हें इन शब्दों के अर्थ भी ठीक से मालूम न रहे हो, लेकिन उनके स्वभाव में ये गुण स्वाभाविक रूप से मौजूद थे। इसकी एक बड़ी मिसाल उनके बचपन की एक फिल्म से मिलती है। फिल्म थी ‘तू पायल मैं गीत’, जिसके निर्देशक कनक मिश्रा थे। इसमें उन्हें शशि कपूर के बचपन का रोल मिला था। उस भूमिका में उन्हें सितार बजाना था। इतनी कम उम्र में भी वे चेंबूर से बस पकड़कर बांद्रा जाते थे। सिर्फ सितार सीखने के लिए वे दो बसें बदलते थे। उनका कहना था कि फिल्म में जो धुन बजेगी, मेरे हाथ भी सितार पर वैसे ही चलने चाहिए, तभी लगेगा कि मैं सच में बजा रहा हूं। सोचिए, उस उम्र में एक बच्चे की यह सोच थी।
उस दौर में जब इतने ज्यादा रियलिस्टिक वाले एक्टर नहीं थे, तब भी उनके भीतर यह समझ थी। दिलीप कुमार साहब ने अपने कॅरियर के शिखर पर पहुंचने के बाद फिल्म ‘कोहिनूर’ के लिए सितार सीखा था, ताकि पर्दे पर उसे बजाते समय वो वास्तविक लग सके। लेकिन अनिल कपूर के मन में यह भावना बचपन से ही थी कि सितार बजाऊं तो लगना चाहिए जैसे मैं बजा रहा हूं।
दुर्भाग्य से वह फिल्म कुछ दिन की शूटिंग के बाद ही बंद हो गई। मगर बालक अनिल कपूर का हौसला टूटने के बजाय और मजबूत बन गया। वह लगातार अपनी कला और अभिनय पर मेहनत करते रहे। जवान होने पर उन्होंने तय किया कि उन्हें बेस्ट ट्रेनिंग लेनी है और इसके लिए उन्होंने एफटीआईआई पुणे का रुख किया। मेहनत तो वो बचपन से ही कर रहे थे, लेकिन लिखित परीक्षा में वह सफल नहीं हो सके। मगर उन्होंने हार नहीं मानी। उस समय संस्थान के प्रिंसिपल गिरीश कर्नाड थे। अनिल कपूर उनसे मिलने गए, बहुत आग्रह किया और कहा कि लिखित परीक्षा में भले ही मैं पीछे रह गया हूं, लेकिन आप मुझसे अभिनय करवाकर देखिए। आप जो भी सीन देंगे, मैं यहीं आपके सामने कर सकता हूं। लेकिन गिरीश कर्नाड नहीं माने।
अनिल कपूर चाहते तो किसी की सिफारिश भी करवा सकते थे। वो मामूली घर के बेटे नहीं थे। उनके पिता सुरेंद्र कपूर जी इंडस्ट्री की एक बड़ी शख्सियत थे। उनका काफी रसूख भी था। लेकिन अनिल के मन में यह बात पक्की थी कि जो भी हासिल करना है, अपनी योग्यता और अपनी मेहनत के दम पर करना है। यही कारण है कि एफटीआईआई में प्रवेश न मिलने के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। इसी बात पर मुझे कमल शबनम जी का एक शेर याद आता है :
कुछ ऐसे मुकाम पर लाई है नाकामी मुझको, जहां से अक्सर हौसले जवान होते हैं।
हालांकि मेरा किस्सा यहीं खत्म नहीं होता है, लेकिन शब्दों की सीमा आड़े आ रही है। बाकी किस्सा अगले कॉलम में। किंतु यहां यह कहना मुनासिब है कि अनिल कपूर साहब का सफर हमें सिखाता है कि प्रतिभा के साथ अगर अनुशासन और लगातार मेहनत जुड़ जाए तो उम्र और हालात कोई मायने नहीं रखते। असली कलाकार वही है जो हर दौर में खुद को नया बनाता रहे और हर चुनौती को अवसर में बदल दे। आज अनिल कपूर साहब के लिए फिल्म ‘मेरी जंग’ का ये गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए :
जिंदगी हर कदम एक नई जंग है…









