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आज हम पिछले सप्ताह की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जानेंगे कि बहु-भुजाओं वाली देवियों ने समय के साथ और कौन-कौन से रूप धारण किए, वे राजाओं के साथ कैसे जुड़ीं और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी क्या भूमिका रही। समय के साथ बहु-भुजाओं वाली देवियों ने अनेक रूप ग्रहण किए। ये देवियां विशेषकर जैन मंदिरों में लोकप्रिय थीं। जैन मंदिरों में अंबिका, पद्मावती और चक्रेश्वरी जैसी देवियां तीर्थंकरों की रक्षिका के रूप में पाई जाती हैं। बहु-भुजाओं वाली देवियां योगिनियों और डाकिनियों के रूप में तांत्रिक देवालयों में भी मिलती हैं। हिंदू और बौद्ध धर्मावलंबी उन्हें पूजते हैं। हम पाते हैं कि नेपाल में नव-दुर्गा की धारणा के अनुसार नगर बनाए गए हैं। ऐसे नगरों में संरक्षक देवी तलेजु का मंदिर केंद्र में होता है और अन्य आठ देवियों के मंदिर आठ दिशाओं में स्थित होते हैं। समय के साथ तलेजु देवी को भैरव या विष्णु जैसे देवता की पत्नी के रूप में भी देखा जाने लगा। यह मान्यता थी कि राजाओं का जन्म उनके मिलन से होता है। राजत्व के साथ जुड़ने के कारण देवियों का महत्व भी बढ़ने लगा। दुर्गा राजाओं के साथ सबसे निकटता से जुड़ गईं। यह माना जाता था कि वे राजाओं के दुर्गों की रक्षा करती हैं और उन्हें शासन करने की शक्ति भी प्रदान करती हैं। ऐसी कथाएं भी मिलती हैं, जिनमें देवी किसी व्यक्ति के स्वप्न में आकर उसे तलवार देती हैं या किसी निधि की जानकारी देती हैं। इससे उसे संकेत मिलता था कि उसका भविष्य में राजा बनना निश्चित है। 9वीं सदी में बंगाल के पाल राजवंश की कला में राजा को विष्णु के रूप में चित्रित किया गया। विष्णु की दो पत्नियां लक्ष्मी और सरस्वती राजा को समृद्धि और कला-बोध प्रदान करती थीं। देवी की सहायता के बिना किसी पुरुष का राजा बनना असंभव माना जाता था। देवी को ‘राजराजेश्वरी’ कहा गया, अर्थात राजपरिवारों की अधिष्ठात्री देवी। कहा जाता है कि राजराजेश्वरी का सिंहासन देवताओं के शरीरों से निर्मित था। यहां हम देख सकते हैं कि किस प्रकार लैंगिक भूमिकाएं भी उलट गईं। यह भी माना जाता था कि जब पाल राजा किसी प्रतिद्वंद्वी राजा को पराजित करते थे, तो उस राजा से जुड़े देवताओं की भी पराजय होती थी। इसके बाद वे देवता विजयी राजा के सिंहासन का हिस्सा बन जाते थे और देवी उन पर आसीन होती थीं। देवी को विजयी राजा की माता माना जाता था। इन सभी मान्यताओं के कारण लोगों में देवियों का महत्व और उनकी लोकप्रियता दोनों बढ़ गई। समय के साथ शिव, विष्णु और देवी के आराधकों के बीच संघर्ष भी देखने को मिलता है। शांति बनाए रखने के लिए अक्सर कला में देवी को दोनों देवताओं के बीच दिखाया जाने लगा। हालांकि, जहां किसी देवता को सामान्यतः दो पत्नियों के साथ दिखाया जाता है, वहीं किसी देवी के दो पति नहीं होते। एक देवता, प्रायः शिव, उनके पति होते हैं और दूसरे देवता, विष्णु, उनके भ्राता के रूप में माने जाते हैं। या फिर दोनों देवता देवी के पुत्र या संरक्षक के रूप में चित्रित किए जाते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देवी को क्रांतिकारी वातावरण के अनुरूप ढालने के लिए भारत देश को देवी का रूप दिया गया। कई लेखकों ने भारत माता को श्रीहीन चामुंडा देवी के रूप में वर्णित किया। इस प्रकार उन्होंने रूपक के माध्यम से यह दिखाया कि विदेशी शासकों ने हमारे देश की संपत्ति और शक्ति को कैसे लूटा। 10वीं सदी में चामुंडा मूलतः रणभूमि, शवों और भूतों की देवी मानी जाती थीं। स्वतंत्रता सेनानियों, जो स्वयं को भारत माता के सुपुत्र मानते थे, ने उनकी महिमा को पुनः स्थापित करने का संकल्प लिया। इस प्रकार कुलदेवी और ग्रामदेवी को भारत माता का रूप दिया गया। लेकिन कलाकार इस बात पर सहमति नहीं बना सके कि भारत माता को हाथ में सरस्वती की तरह पुस्तक के साथ, लक्ष्मी की तरह धान्य के साथ या दुर्गा की तरह त्रिशूल के साथ चित्रित किया जाना चाहिए।
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