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- Rajdeep Sardesai’s Column: What Should We Understand From The “high Command” Culture In Politics?
10 घंटे पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
इस हफ्ते भाजपा ने 45 वर्षीय नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय ‘कार्यकारी’ अध्यक्ष चुना। बिहार के बाहर शायद ही किसी ने उन पर इससे पहले ध्यान दिया होगा। लेकिन अब उन्हें भाजपा का ‘उभरता सितारा’ बताया जा रहा है।
‘कौन बनेगा अध्यक्ष’ को लेकर चल रही तमाम राजनीतिक अटकलों में उनका उल्लेख दूर-दूर तक कहीं नहीं था। और अचानक उनके नाम का ऐलान कर दिया गया। नई दिल्ली में पार्टी मुख्यालय के बाहर उन्हें माला पहनाने के लिए भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता और नेता जुट गए, हालांकि कुछ ने यह भी स्वीकार किया कि उनको पहचानने में उन्हें थोड़ी मुश्किल हुई।
और इसके बावजूद इस ‘चयन’ के खिलाफ पार्टी में असहमति की एक आवाज नहीं उठी। एक नेता ने कहा, हम एक अनुशासित पार्टी हैं। अनुशासित? शायद। लेकिन लोकतांत्रिक? शायद इतनी नहीं। क्योंकि नवीन के चयन का फैसला किसी व्यापक आंतरिक परामर्श की प्रक्रिया से नहीं निकला था, बल्कि यह लगभग पूरी तरह से ‘हाई कमान’ द्वारा तय किया गया था।
भाजपा ‘हाई कमान’ के एकतरफा फैसलों की तुलना कांग्रेस नेतृत्व की उस हिचकिचाहट से कीजिए, जो बेंगलुरु में अब भी इस सवाल पर उलझा हुआ है कि सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने रहें या उनकी जगह डीके शिवकुमार को दी जाए। 2022 को याद कीजिए, जब कांग्रेस का ‘हाई कमान’ अशोक गहलोत को पार्टी अध्यक्ष पद संभालने के लिए राजी नहीं कर पाया था।
आज भी, जब शशि थरूर जैसे हाई-प्रोफाइल सांसद अहम मुद्दों पर पार्टी लाइन से अलग राय रखते हैं, तो कांग्रेस ‘हाई कमान’ कोई खुले टकराव की राह नहीं अपनाता। अनुशासित? नहीं तो। लोकतांत्रिक? हां, कुछ हद तक। कम से कम आज कांग्रेस में गांधी परिवार से सवाल करने की गुंजाइश कहीं ज्यादा है।
अलबत्ता यह अब भी नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस रातों-रात पूरी तरह से ‘लोकतांत्रिक’ संगठन बन गई है या भाजपा ने अचानक पुराने दौर की कांग्रेस जैसी निर्णय-प्रक्रिया अपना ली है। सच्चाई यह है कि ‘हाई कमान’ संस्कृति व्यक्ति-केंद्रित राजनीति की उपज होती है, जहां आंतरिक लोकतंत्र से ऊपर सत्ता को पूजा जाता है।
एक दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर रहने के कारण कांग्रेस का ‘हाई कमान’ अब इतना कमजोर पड़ चुका है कि उसके प्रति भय का तत्व कैडर में लगभग खत्म हो गया है। इसके ठीक उलट, भाजपा इसी कालखण्ड में तेजी से मजबूत हुई है।
जब तक चुनाव मोदी के नाम पर जीते जा रहे हों और शाह को चाणक्य के रूप में पेश किया जाता हो, तब तक भला किसी को यह चिंता क्यों होने लगी कि पार्टी के भीतर कोई वास्तविक संवाद है या नहीं? आखिरी बार भाजपा के संसदीय बोर्ड ने कब किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर सार्थक चर्चा की थी? या राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कब कोई गंभीर बहस देखने को मिली थी?
मुख्यमंत्री चुनने से लेकर पार्टी की रणनीति तय करने तक, अब हर रास्ता ‘हाई कमान’ के दरवाजे पर जाकर खत्म होता है। राजस्थान और गुजरात में पहली बार के विधायकों को मुख्यमंत्री बना देने के निर्णयों से भी यही झलका था।
एक मायने में भाजपा ने अपना ‘हाई कमान’ मॉडल इंदिरा गांधी से ही सीखा है। आखिर दिल्ली से मुख्यमंत्री चुनने और क्षेत्रीय क्षत्रपों से बिना सवाल किए सहमति जताने की अपेक्षा रखने की कला इंदिरा ने ही निपुणता से साधी थी। 1982 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में बाबासाहेब भोसले का चयन तो अब इस राज्य की राजनीतिक किंवदंतियों में शुमार है।
बैरिस्टर भोसले का न कोई जनाधार था, न अति-महत्त्वाकांक्षा, फिर भी कई वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया गया था। कई अनुभवी राजनीतिक पत्रकारों को भी अंतिम क्षण में उनके बारे में पर्याप्त जानकारी जुटाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी थी।
पर एक मामले में भाजपा ‘हाई कमान’ कांग्रेस से अलग है। मोदी-शाह ने इसका इस्तेमाल पार्टी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव लाने के लिए किया है। आज लगभग सभी भाजपा मुख्यमंत्री पचास की उम्र के आसपास हैं, जिससे पार्टी यह दावा कर सकती है कि उसका चेहरा अपेक्षाकृत युवा है। इसके उलट, कांग्रेस अब भी वयोवृद्ध नेताओं के बीच फंसी हुई है, जो सेवानिवृत्त होने को तैयार नहीं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)







