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‘जब मैं अपने पॉडकास्ट ‘फिगरिंग आउट’ के लिए किसी सफल उद्यमी या आइकन से बात कर रहा होता हूं, तो पीछे मुड़कर खुद को जरूर देखता हूं। इंदौर का वह लड़का, जो मध्यमवर्गीय परिवार के संघर्षों को देख रहा था और जिसके मन में सिर्फ एक आग थी… कुछ बड़ा करने की। आज जब मैं 2026 का भारत देखता हूं, तो मुझे वही आग करोड़ों युवाओं की आंखों में दिखती है। इस आग के साथ बहुत सारे सवाल और डर भी हैं। मुझसे पूछा जाता है-पॉडकास्टिंग या कंटेंट क्रिएशन जैसे ‘गैर-पारंपरिक’ क्षेत्रों में भविष्य है? सच कहूं तो, मुझे ‘गैर-पारंपरिक’ शब्द अब थोड़ा पुराना लगता है। यह पिछली पीढ़ी का शब्द है, क्योंकि उनके पास इंटरनेट की वह ताकत नहीं थी जो आज हमारे पास है। आज का युवा जिस दुनिया में सांस ले रहा है, वहां डिजिटल प्लेटफॉर्म ही मुख्यधारा है। कुछ भी ‘गैर-पारंपरिक’ नहीं है। यहां यह समझना जरूरी है- मैं पॉडकास्टिंग को करियर के रूप में नहीं देखता। मेरे लिए यह सिर्फ लोगों तक पहुंचने का जरिया है। जब हमने ‘फिगरिंग आउट’ शुरू किया था, तो वह सिर्फ शो था, पर उस एक माध्यम ने हमें कंटेंट एजेंसी, एकेडमी और बड़ा प्रोडक्शन सेटअप बनाने में मदद की। आज सवाल यह नहीं है कि पॉडकास्टिंग व्यावहारिक है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आप किसी विशेष क्षेत्र में इतने माहिर बन सकते हैं कि लोग आप पर भरोसा करें? 2026 की इकोनॉमी ‘ट्रस्ट इकोनॉमी’ है। अगर भरोसा जीत सकते हैं, तो कुछ भी बेच सकते हैं, कुछ भी बना सकते हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में एक अजीब सा विरोधाभास है। इसने मेरे जैसे इंदौर के लड़के को वह मंच दिया जो शायद बड़ा संस्थान नहीं दे पाता। इसने मुझे आत्मविश्वास दिया। पर दूसरी ओर, यह असुरक्षा की खान भी है। लाखों युवा दूसरों की ‘हाइलाइट रील’ देखकर असली जिंदगी की तुलना कर रहे हैं। नियम सीधा है: यदि आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ ‘कंज्यूम’ (उपभोग) करने के लिए करेंगे, तो असुरक्षित महसूस करेंगे। अगर ‘क्रिएट’ (निर्माण) करेंगे, तो यही प्लेटफॉर्म आपके लिए सबसे बड़ा लॉन्चपैड बन जाएगा। आत्मविश्वास निर्माण से आता है, देखने से नहीं। जब मैं 20 साल का था, तब मेरे लिए सफलता का अर्थ था… पलायन। मुझे उस छोटे शहर की सीमाओं से निकलना था, उस मध्यमवर्गीय तंगी से बचना था। वह ‘सर्वाइवल मोड’ वाली सफलता थी। आज का युवा अलग दौर में है। आज सफलता का मतलब है ‘उद्देश्य के साथ स्वतंत्रता’। आपके पास चुनने की आजादी होनी चाहिए और देश की ताकत को दुनिया के नक्शे पर चमकाने का बड़ा मकसद होना चाहिए। आज के युवाओं में बड़ी समस्या ‘अधूरी रह गई क्षमता’ की है। वे अपने दिमाग में ‘मुझमें बहुत पोटेंशियल है’ के गुब्बारे में जी रहे हैं। इसी वजह से वे छोटी शुरुआत नहीं कर पा रहे। मेरी सलाह बहुत स्पष्ट है- अपनी एक छोटी सी स्किल को इतना पैना बना लो कि दुनिया तुम्हें नजरअंदाज न कर सके। महान बनने के लिए शुरुआत करना जरूरी नहीं है, लेकिन शुरुआत करने के लिए आपका छोटा होना जरूरी है। अब बात एआई की… लोग डर रहे हैं कि एआई नौकरियां ले लेगा। मेरा मानना है कि एआई आपकी तकनीकी क्षमताएं तो ले सकता है, पर आपका ‘मानवीय एकाधिकार’ नहीं छीन सकता। आपको चार चीजों पर दांव लगाना होगा संचार, निर्णय, सुरुचि व विश्वास-निर्माण। एआई स्क्रिप्ट लिख सकता है, पर भरोसा पैदा नहीं कर सकता। वह रटकर काम कर सकता है, लेकिन जब आप कमरे में दाखिल होते हैं, तो जो औरा आप पैदा करते हैं, वह कभी नहीं कर सकता। रटने वाली शिक्षा व प्रमाणपत्रों का महत्व खत्म हो रहा है। अब महत्व है ‘बौद्धिक जिज्ञासा’ का। यह जानने का कि क्या पूछना है और क्यों पूछना है। अंत में, मैं कहना चाहता हूं कि आप जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी गलतियां करें। हम अक्सर ‘परफेक्ट’ होने का इंतजार करते हैं- सही डिग्री, सही निवेश, या सही समय। पर सच यह है कि ‘तत्परता’ एक मिथक है। आप कभी तैयार नहीं होते। बस कूद पड़ते हैं, और वही छलांग आपको तैयार करती है। मैंने आश्वस्त होने से पहले बोलना शुरू किया, दर्शक मिलने से पहले पॉडकास्ट शुरू किया और प्लेबुक मिलने से पहले कंपनी बनाई। 2026 का भारत आपका है, पर सिर्फ तब तक, जब तक आप ‘फिगर आउट’ करने की हिम्मत रखते हैं… तो उठिए, शुरू कीजिए, और दुनिया को अपनी चमक दिखाइए।’ गलती… जो युवाओं को कम उम्र में करनी चाहिए 20 साल की उम्र में विफल होने की कीमत बहुत कम है- सिर्फ थोड़ा सा घायल अहंकार। पर 40 की उम्र में विफलता की कीमत बहुत बड़ी होती है। इसलिए, जब आपके पास खोने के लिए सबसे कम हो, तब सबसे बड़े दांव खेलें। जल्दी शर्मिंदा होने की आदत डाल लें। जब आप लोगों के जजमेंट का डर छोड़ देते हैं, तभी आप वास्तविक जोखिम लेने और बड़ी सफलता पाने के काबिल बनते हैं।
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