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स्मार्टफोन की स्क्रीन पर अंगुलियां चलाते और कानों में ईयरबड्स ठूंसे आज की पीढ़ी जब सड़कों या पार्कों से गुजरती है, तो सामने से आ रहे व्यक्ति के लिए उसकी नजरें पूरी तरह कोरी होती हैं। आजकल हम लोग एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां लोग एक-दूसरे के पास से तो गुजरते हैं, लेकिन एक-दूसरे को ‘देखते’ नहीं हैं और न ही बात करते हैं। अमेरिका की मशहूर लेखिका स्टेसी ली इसे ‘मौन महामारी’ बताती हैं। ली कहती हैं, ‘आज की भागदौड़ और डिजिटल व्यस्तता के बीच हमने आपस में ‘हेलो’ कहना लगभग बंद कर दिया है। यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि सामने वाले के अस्तित्व को स्वीकार करने का सबसे छोटा और खूबसूरत जरिया है।’ अध्ययन बताते हैं कि अजनबियों से दूरी बनाने की यह आदत हमें भीतर से और अकेला कर रही है। जब हम किसी को देखकर मुस्कुराते हैं या एक छोटा सा ‘नमस्कार’ कहते हैं, तो यह केवल एक अभिवादन नहीं होता, बल्कि समाज को जोड़ने वाला अदृश्य नेटवर्क तैयार करता है। इससे मानसिक खुशी मिलती है। छोटे रिश्तों को जादुई असर शिकागो यूनिवर्सिटी के व्यवहार वैज्ञानिक निकोलस एप्ले और जुलियाना श्रोएडर के शोध के मुताबिक, जो लोग ट्रेन, बस या कॉफी शॉप में अजनबियों से छोटी बातचीत शुरू करते हैं, वे उन लोगों की तुलना में काफी अधिक खुश और सकारात्मक महसूस करते हैं, जो चुपचाप अपने फोन में डूबे रहते हैं। एप्ले कहते हैं कि ऐसे छोटे-छोटे रिश्तों का जादुई असर पड़ता है। लेखिका स्टेसी ली लिखती हैं कि ऑनलाइन दुनिया में जहां हर तरफ गुस्सा और नफरत ज्यादा दिखती है, वहीं ऑफलाइन दुनिया में लोग अब भी बेहद सामान्य और मददगार हैं। बस कमी है तो पहल करने की। भारत में ‘नमस्कार’ समाज को जोड़ने की कड़ी दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. सतीश कुमार कहते हैं, ‘पड़ोसियों या राहगीरों से ‘राम-राम’ या ‘नमस्कार’ कहने की पुरानी भारतीय परंपरा केवल औपचारिकता नहीं थी। यह एक सामाजिक व्यवस्था थी, जो एक-दूसरे को जोड़ने का काम करता है।’ आज लोग सोशल मीडिया पर हजारों की भीड़ से घिरे हैं, लेकिन असल जिंदगी में अकेले हैं। जबकि कई स्टडी में सामने आया है कि अजनबियों से छोटा सा संवाद भी दिमाग में डोपामाइन (हैप्पी हार्मोन) रिलीज करता है, जिससे सुरक्षा की भावना बढ़ती है और अकेलापन कम होता है। इसके अलावा सामाजिक जड़ें मजबूत होती हैं।
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