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शेखर गुप्ता का कॉलम: बदलाव वही ला सकते हैं, जो चुनाव जीतते हैं

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2 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

2014 में कांग्रेस लोकसभा चुनाव में केवल 44 सीटें जीती थी और अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी। 2019 में उसे 52 और 2024 में 99 सीटें मिलीं, लेकिन इन चुनावों में उसका वोट प्रतिशत लगातार 19 से 21 प्रतिशत के बीच बना रहा। इसका मतलब है कि औसतन हर पांच में से एक भारतीय मतदाता कांग्रेस के चुनाव चिह्न ‘हाथ’ का बटन दबाता रहा है।

अगर 1996, 1998, 1999 से लेकर 2009 तक के आंकड़ों को देखें, तो पता चलता है कि भाजपा का वोट प्रतिशत मोटे तौर पर 25 प्रतिशत के आसपास बना रहा। उस समय गठबंधन की राजनीति का दौर था। नरेंद्र मोदी ने 2014 में इस समीकरण को बदल दिया। इसके बाद भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 37 से 40 प्रतिशत के बीच पहुंच गया। पहले के मुकाबले 12 से 15 प्रतिशत अंक की यह बढ़ोतरी बहुत बड़ी है और इसे हम आसानी से मोदी के नाम पर मिलने वाले वोट कह सकते हैं।

यह सोचना वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा होगा कि राहुल गांधी निकट भविष्य में कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ाकर 37 प्रतिशत कर देंगे, लेकिन अगर वे कांग्रेस के पक्के वोट प्रतिशत में 5 से 6 प्रतिशत की भी बढ़ोतरी कर देते हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति बदल जाएगी। 32 प्रतिशत वोट मिलने पर भी भाजपा का दबदबा बना तो रहेगा, लेकिन लोकसभा में उसकी सीटों की संख्या 200 से कुछ ऊपर या नीचे रह सकती है।

इसके बावजूद वह सरकार बना सकती है, लेकिन वह गठबंधन की सरकार होगी, जिसमें नेतृत्व को लेकर समस्याएं होंगी। मोदी और शाह ने इस खतरे को कभी हल्के में नहीं लिया। वे जानते हैं कि 20 प्रतिशत वोट का आधार होने के कारण कांग्रेस ही उनके लिए एकमात्र बड़ी चुनौती है। अब सवाल यह है कि राहुल इसके आगे कहां तक जाएंगे?

फिलहाल उनका पूरा ध्यान सड़कों और गलियों में लोगों को सरकार के खिलाफ खड़ा करने पर है। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि भारत में राजनीतिक बदलाव वही लोग लाते हैं, जो चुनाव जीतते हैं या दूसरे दलों से हाथ मिलाकर सत्ताधारी पार्टी को हराते हैं। सड़कों के दम पर सत्ता बदलने का सपना एक भ्रम है, क्योंकि ऐसे लोग चुनाव कभी नहीं जीत सकते। संघ और लोहियावादियों की सड़कों पर पकड़ थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से ताकत मिलने के बावजूद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले नवनिर्माण आंदोलन और जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व वाली रेलवे हड़ताल की संयुक्त ताकत भी इंदिरा गांधी की सरकार को नहीं गिरा पाई थी। इसके लिए उन्हें 1977 के चुनाव तक इंतजार करना पड़ा। 2010 से 2012 के बीच अण्णा आंदोलन और संघ/भाजपा मिलकर भी नाकाम साबित हो चुकी यूपीए सरकार को सत्ता से नहीं हटा पाए थे। इसका फैसला 2014 के चुनाव में ही हो सका। अब 2029 में जब चुनाव होंगे, तब राहुल अपने राजनीतिक जीवन के 25 साल पूरे कर रहे होंगे। उस समय उनकी उम्र 59 साल होगी। भारतीय राजनीति के हिसाब से तब भी उन्हें युवा ही माना जाएगा।

अगर यह मान लिया जाए कि कांग्रेस और भाजपा को अपने-अपने विचारों से सहमत लोगों के वोट मिलते रहेंगे, तो यह भी कहा जा सकता है कि मोदी के कारण भाजपा को मिलने वाले वोट केवल ऊबकर राहुल के पक्ष में नहीं चले जाएंगे। राहुल को इससे बेहतर, कुछ नया करने वाला और उम्मीद जगाने वाला विकल्प देना होगा। उन्हें बताना होगा कि अगर वे चुनाव जीतते हैं, तो मोदी और भाजपा से अलग क्या करेंगे?

मैं 12 सवाल रखना चाहता हूं।

1. चुनाव आयुक्तों को चुनने की प्रक्रिया क्या होगी और चुनाव आयोग की निष्पक्षता कैसे बहाल करेंगे? कांग्रेस के दौर की व्यवस्था की वापसी कोई उत्साह बढ़ाने वाली बात नहीं होगी। राहुल के दिवंगत पिता ने 1989 में चुनाव आयोग को तीन सदस्यों वाली संस्था बनाकर उसे कमजोर करने की कोशिश की थी। इसके अलावा, भाजपा जिन्हें घुसपैठिया कहती है, उन्हें मतदाता बनने से रोकने के लिए राहुल क्या व्यवस्था करेंगे?

2. इसी तरह, न्यायपालिका, सीबीआई और दूसरी अहम एजेंसियों के मामले में वे क्या करेंगे?

3. ट्रम्प का सामना वे कैसे करेंगे? अमेरिका को लेकर उनकी नीति किस तरह अलग होगी?

4. चीन और पाकिस्तान के प्रति उनका रुख कैसा रहेगा? पाकिस्तान से पैदा होने वाले आतंकवाद के मामले में उनकी नीति मोदी से किस तरह अलग होगी?

5. पश्चिम एशिया और इजरायल के प्रति उनका रुख मोदी के रुख से किस तरह अलग होगा?

6. ऊर्जा, पूंजी और सोने की कमी से भारत को निकालने के लिए उनका क्या नजरिया है? अब इसमें हम एआई और सॉफ्टवेयर सेवाओं को भी जोड़ सकते हैं। वे भारत को निवेशकों के लिए आकर्षक कैसे बनाएंगे?

7. चारों तरफ ‘छात्रों की गूंज’ सुनाई दे रही है, लेकिन राहुल ज्यादा रोजगार कैसे देंगे? कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए क्या वे मनरेगा को जारी रखेंगे या उसका कोई नया और बेहतर रूप लाएंगे? क्या वे मुफ्त अनाज बांटने की योजना जारी रखेंगे?

8. क्या वे अब भी जाति जनगणना को सामाजिक न्याय का हिस्सा मानते हैं? इससे रोजगार के ज्यादा अवसर कैसे पैदा होंगे? तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को ही नहीं पता कि उन्होंने जो जाति जनगणना करवाई है, उसके आंकड़ों का क्या करना है। क्या राहुल कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से कहेंगे कि वे अपने राज्य में हुई जाति जनगणना के आंकड़े जारी करें?

9. शिक्षा व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्त करने, उसमें सुधार लाने और युवाओं को रोजगार के योग्य बनाने के लिए वे किस तरह के बदलाव करना चाहते हैं?

10. वे कहते हैं कि वे कारोबार या पूंजी के खिलाफ नहीं हैं। वे सिर्फ एकाधिकार के खिलाफ हैं और सभी को समान अवसर देना चाहते हैं। तो इसके लिए वे क्या करेंगे? आर्थिक सुधारों को लेकर उनके विचार क्या हैं?

11. राहुल शिकायत करते हैं कि अल्पसंख्यकों को समाज में किनारे किया जा रहा है। लेकिन राहुल उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए क्या करेंगे?

12. उनकी टीम में कौन-कौन शामिल होंगे? सिर्फ सड़कों पर संघर्ष करने वाले नेता के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय चुनौती के रूप में सामने आने के लिए राहुल को इन सवालों के जवाब देने होंगे।

सत्ता बदलने का सपना…

फिलहाल राहुल गांधी का पूरा ध्यान सड़कों और गलियों में लोगों को सरकार के खिलाफ खड़ा करने पर है। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि भारत में राजनीतिक बदलाव वही लोग लाते हैं, जो चुनाव जीतते हैं या दूसरे दलों से हाथ मिलाकर सत्ताधारी पार्टी को हराते हैं। सड़कों के दम पर सत्ता बदलने का सपना एक भ्रम है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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