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- Column By Sachin Kalbag – Why Must We Always Remain Dependent On Other Countries For Oil?
14 घंटे पहले
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सचिन कलबाग वरिष्ठ पत्रकार और सेंट जेवियर्स कॉलेज मुम्बई में प्रोफेसर
ट्रम्प ने कहा है कि वे 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद नए हथियारों के साथ ईरान पर हमला करेंगे। इनमें कथित “मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स’ भी शामिल होगा। यदि ट्रम्प अपनी इस धमकी पर अमल करते हैं तो इससे बेवजह होने वाली जनहानि के अलावा वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी गंभीर असर पड़ेगा। खासकर भारत पर, जो अपनी जीवाश्म ईंधन की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के आंकड़े चिंताजनक तस्वीर दिखाते हैं। दिसंबर 2025 में भारत ने अपने आयातित कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 62 डॉलर प्रति बैरल चुकाई थी। अगस्त 2026 में यह बढ़कर 90 डॉलर और सितंबर में 116 डॉलर प्रति बैरल हो गई। यानी महज नौ महीने पहले चुकाई गई कीमत से दोगुनी। ऐसे में पूरी आशंका है कि अमेरिका और इजरायल के ईरान पर प्रस्तावित हमले से तेल कीमतें फिर बढ़ सकती हैं।
महंगाई और लागतों में बढ़ोतरी के इस दबाव को झेलने के लिए भारत को बेहद मजबूत कवच चाहिए। साथ में डॉलर के मुकाबले रुपए के और निचले स्तर पर पहुंचने का वास्तविक खतरा तो बना ही हुआ है।
ईरान पर अमेरिका के किसी भीषण हमले का मतलब होगा कि भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी)- जो अभी जीडीपी के 1.2 से 1.4% के बीच है- आसानी से बढ़ सकता है। हमारे आयात बिल में 35 से 40 अरब डॉलर की बढ़ोतरी भी सीएडी को जीडीपी के 2.2% से ऊपर पहुंचा सकती है, जिससे आरबीआई को रुपए को स्थिर रखने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचने पड़ सकते हैं।
फिर, देश में सड़कों पर चल रहे हालिया विरोध प्रदर्शनों के अलावा एक और बड़ी समस्या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में बढ़ोतरी की हो सकती है। हमारी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा- लॉजिस्टिक्स, कृषि और मैन्युफैक्चरिंग- डीजल पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ते हैं तो देश में कीमतें नियंत्रित रखने के लिए सरकार और तेल कंपनियों को करों में कटौती करने या कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ खुद झेलने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
दोनों ही स्थितियों में रेल और सड़क ढांचा निर्माण जैसे अहम पूंजीगत खर्च के लिए आवंटित होने वाला बजट तेल संकट से निपटने में खपाना पड़ेगा।अब तक भारत ने रूस और ईरान के साथ व्यापार को लेकर अमेरिकी प्रतिबंधों के अप्रत्यक्ष प्रभावों से निपटने के लिए तीन प्रमुख तरीके अपनाए हैं।
पहला, स्विफ्ट के तहत पश्चिम की बैंकिंग पाबंदियों को सक्रिय किए बगैर रूस से मल्टी-करंसी व्यवस्था में व्यापार करना। दूसरा, भारतीय खरीदार सरकारी ऋणदाताओं के बजाय गैर-पश्चिमी समुद्री परिवहन सेवाओं और निजी बीमा समूहों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं, ताकि अमेरिका के विदेशी परिसंपत्ति नियंत्रण कार्यालय (ओएफएसी) के प्रतिबंधों से सरकारी बैंकों को बचाकर रखा जा सके। तीसरा तरीका कूटनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल है।
भारत अकसर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को यह समझाता रहा है कि यदि रूस से प्रतिदिन 18 से 20 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति पर रोक लगाई गई और भारतीय रिफायनरियों तक इसकी पहुंच रोकी गई तो वैश्विक आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है। इससे ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल से काफी ऊपर जा सकती है।
लेकिन अस्थायी उपायों का असर अब अपनी सीमा पर पहुंच गया है। भारत को अस्थिर ऊर्जा बाजारों से खुद को अलग करने के प्रयास तेज करने होंगे। इसके लिए 20% एथेनॉल मिश्रण अनिवार्य करने में तेजी लाना, औद्योगिक स्तर पर सौर ऊर्जा क्षमता को बढ़ाना और इंडियन स्ट्रेटजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (आईएसपीआरएल) के तहत घरेलू तेल भंडारों को बढ़ाना जरूरी है।
- वैश्विक तेल बाजार की उठापटक का सीधा असर पेट्रोल पंपों, किराना दुकानों और परिवारों के बजट पर पड़ता है। जब तक हम अपने कच्चे तेल की जरूरतों का अधिकांश हिस्सा आयात करते रहेंगे, परिवहन लागत और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती रहेंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)







