सुनीता नारायण का कॉलम:  पर्यावरण को ध्यान में रखकर भी हम विकास कर सकते हैं
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सुनीता नारायण का कॉलम: पर्यावरण को ध्यान में रखकर भी हम विकास कर सकते हैं

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13 घंटे पहले

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सुनीता नारायण पर्यावरणविद् - Dainik Bhaskar

सुनीता नारायण पर्यावरणविद्

भारत को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठाना चाहिए- जब ​मैंने विभिन्न यूरोपीय देशों के जलवायु परिवर्तन दूतों के एक समूह से यह बात कही तो उनके चेहरों पर असमंजस के भाव थे। मैंने उन्हें अपने कारण बताए।

विकास भारत जैसे देश के लिए बड़ी चुनौती है। यह विकास समावेशी और टिकाऊ भी होना चाहिए। अगर हम इसे हासिल करते हैं, तो हम एक बेहतरीन लक्ष्य पर पहुंच जाएंगे- स्थानीय प्रदूषण को कम करने और ग्रीन-आजीविका को बढ़ावा देने के लिए हमारे कदम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को भी कम करेंगे।

इस तरह, हमारा राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) पारस्परिक-लाभों पर आधारित होगा। दूसरे शब्दों में अगर सही तरीके से विकास किया जाए, तो वह जलवायु परिवर्तन के संकट का भी सामना कर सकता है।

दुनिया के दूसरे तमाम देशों की तरह भारत को भी विकास करना है। इसका मतलब है लाखों लोगों को रोजगार देना, उन्हें स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आवास प्रदान करना और ऊर्जा आपूर्ति को बढ़ाना। विकास के लिए हमें ऐसी कार्रवाई की आवश्यकता होगी, जो सभी की जरूरतों को पूरा करे। इसके लिए रणनीति में बदलाव की जरूरत है।

हम पूंजी और संसाधनों की प्रचुरता वाले मार्ग का जोखिम नहीं उठा सकते, क्योकि वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है और समाज में भी ​असमानता को बढ़ाता है। हम पहले प्रदूषण फैलाने और फिर उसकी सफाई करने के पश्चिमी देशों के दृष्टिकोण को नहीं अपना सकते।

हमारे पास नुकसान की मरम्मत के लिए वित्तीय साधन भी नहीं हैं। ऐसे में हमें विकास की अपनी अवधारणा को फिर से आविष्कृत करना होगा और भारत में कई नीतियों ने यही किया है। यह भारत जैसे देशों के लिए अनूठा अवसर है कि वह विकास को जलवायु-कार्रवाई के खिलाफ खड़ा करने के बजाय उसे विकास के लिए बनाई गई नीतियों के भीतर समाहित कर सके।

उदाहरण के लिए, हम जानते हैं कि हम अपनी मोबिलिटी के तौर-तरीकों को बदले बिना वायु प्रदूषण को ठीक नहीं कर सकते, क्योंकि निजी वाहन- वो चाहे जितने भी स्वच्छ क्यों न हों- सड़क की जगह घेरते हैं और प्रदूषण और भीड़भाड़ को बढ़ाते हैं।

पश्चिम ने निजी वाहनों को सब्सिडी देने और उनका विद्युतीकरण करने का रास्ता अपनाया है। हमारे पास एक और उपाय है, जो हमारे आवागमन को फिर से परिभाषित करता है। यह है इलेक्ट्रिक बसों और पैराट्रांजिट और दोपहिया वाहनों जैसे किफायती परिवहन में निवेश करना।

भारत का एनडीसी लो-कार्बन वाले सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने के बारे में होना चाहिए, न कि केवल इलेक्ट्रिक कारों की गिनती करने के बारे में। यह नीति हवा को शुद्ध रखने से प्रेरित है, लेकिन इसमें जलवायु परिवर्तन से निपटने का अतिरिक्त लाभ भी है।

उद्योग-जगत से एक उदाहरण देखें : हमारे सीमेंट उद्योग ने फ्लाई ऐश का उपयोग करना शुरू कर दिया है- कार्बन को कम करने के लिए नहीं, बल्कि कचरे को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने, चूना-पत्थर का विकल्प चुनने और ऊर्जा की लागत कम करने के लिए।

लो-कार्बन वाले औद्योगीकरण का भविष्य इसी तरह के समाधानों में निहित है, जिनसे सभी को लाभ हो। जैसे कि लौह अयस्क स्लैग से लेकर बायोमास और कचरे से प्राप्त होने वाले ईंधन तक- ये सभी कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करने और दक्षता में सुधार के लिए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें ग्रीन-इकोनॉमी के विचार को फिर से तैयार करना होगा। हम ग्रीन-एम्प्लॉयमेंट की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि हम जानते हैं कि रिन्यूएल ऊर्जा या ईवी को अपनाने का मतलब आजीविका के अधिक अवसर नहीं होगा। वास्तव में, हाल ही में आई खबरों से पता चलता है कि इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस को अपनाने के कारण यूके में हजारों नौकरियां चली गई हैं।

लोग अगर जलवायु-परिवर्तन के बारे में चिंतित हैं तो वे अपनी आजीविका के बारे में भी चिंता करते हैं। भारत के लिए जरूरी है वह अपनी अर्थव्यवस्था को ऐसे तैयार करे कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग स्थानीय आजीविका के लिए हो।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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