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सुरक्षित जिंदगी, घटता जोखिम: खोने का डर बढ़ने से नए प्रयोगों से पीछे हट रहे लोग; समृद्धि के साथ सुरक्षित रास्ता चुनने की प्रवृत्ति

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नई फिल्म, लेकिन कहानी पुराने किरदारों की। नया कैफे, लेकिन सजावट दूसरे शहर जैसी। किशोर भी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले कई खतरनाक या जोखिम भरी गतिविधियों से दूरी बना रहे हैं। क्या इन बदलावों के पीछे कोई वजह है? अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एडम मास्त्रोइयानी का तर्क है कि आजकल लोग जोखिम कम लेने लगे हैं। इससे जिंदगी सुरक्षित हुई है, लेकिन इससे नए विचारों और रचनात्मक प्रयोगों की गुंजाइश भी सिकुड़ सकती है। तय ‘रास्ते’ या फॉर्मूले से अलग चलने या सोचने की प्रवृत्ति में कमी आ रही है। एडम कहते हैं कि चिंता यह है कि जोखिमभरे कामों से दूरी के साथ कहीं अपरिचित विचार अपनाने का साहस भी तो नहीं घट रहा है। ‘द डिक्लाइन ऑफ डिविएंस’ में एडम बताते हैं कि 2013-2023 के दौरान अमेरिका में हाई स्कूल विद्यार्थियों में ड्रग्स का इस्तेमाल घटा। यह सकारात्मक बदलाव है। लेकिन उसी रिपोर्ट से पता चलता है कि मानसिक सेहत गिरी है और हिंसा बढ़ी है। यानी, सुरक्षित व्यवहार का अर्थ हर लिहाज से बेहतर जीवन नहीं है। एडम के अनुसार, समृद्धि, लंबी आरामदायक जिंदगी बढ़ने पर लोग सेहत, कमाई और प्रतिष्ठा बचाने को अधिक महत्व देते हैं। ऐसे में अनिश्चित करिअर, लीक से हटकर जिंदगी और नए प्रयोग से बचते हैं। खोने का डर उन्हें जोखिम लेने से रोकता है। उदाहरण के तौर पर एडम बताते हैं कि वर्ष 2000 से पहले, ज्यादा कमाई वाली फिल्मों में लगभग 25% सीक्वल, प्रीक्वल या स्पिनऑफ थीं; बाद के दौर में इसकी हिस्सेदारी 75% हो गई। एडम के निष्कर्ष की पुष्टि माइकल पार्क, एरिन लीही और रसेल फंक की रिसर्च से भी होती है। इसमें 4.5 करोड़ शोधपत्रों, 39 लाख पेटेंट के विश्लेषण से पता चलता है कि समय के साथ ऐसे शोध और पेटेंट कम होते गए हैं, जो पहले से मौजूद सोच से हटकर और नई दिशा देने वाले हों। अनिश्चित फायदे की जगह निश्चित लाभ का विकल्प चुनते हैं लोग मनोवैज्ञानिक जीन ट्वेंगी और हीजंग पार्क ने 1976-2016 के बीच 13 से 19 साल के 84 लाख अमेरिकी किशोरों के सात सर्वेक्षणों का विश्लेषण किया। इसमें पता चला कि अधिक आय, लंबी जिंदगी और छोटे परिवारों के किशोरों ने नौकरी, ड्राइविंग और बड़ों के साथ के बिना बाहर जाने की गतिविधियां देर से अपनाया। हालांकि, इससे समृद्धि को इसका अकेला कारण नहीं माना जा सकता।डेनियल काह्नमैन और एमोस टवर्स्की की ‘प्रॉस्पेक्ट थ्योरी’ बताती है कि लाभ वाले विकल्पों में लोग अधिक लेकिन अनिश्चित फायदे की जगह तयशुदा लाभकारी विकल्प ज्यादा चुनते हैं।



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