टिपण्णी

सैयद अता हसनैन का कॉलम: हम ‘एनर्जी-डिप्लोमेसी’ के एक नए दौर में हैं

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एनर्जी का वैश्विक भूगोल बदल रहा है और उसके साथ ही औद्योगिक क्षमता तथा राष्ट्रीय शक्ति के बीच गहराते संबंध भी। दशकों तक हमने एनर्जी की राजनीति में खुद को कमजोर उपभोक्ता के रूप में देखा था। हमारी बढ़ती अर्थव्यवस्था को आयातित कच्चे तेल की जरूरत थी, लेकिन पश्चिम एशिया में होने वाले संघर्ष तेल की कीमतें बढ़ने और आपूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा करते थे। यह कमजोरी आज भी बनी हुई है। लेकिन इस बीच भारत तेल की रिफाइनिंग और पेट्रोलियम उत्पादों के क्षेत्र में बड़ी ताकत बनकर उभरा है। इस उपलब्धि को रणनीतिक चर्चाओं में पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। रिलायंस जामनगर में प्रतिदिन 14 लाख बैरल क्रूड की रिफाइनिंग में सक्षम है। यह एक ही स्थान पर स्थित दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग परिसर है। लेकिन इसका महत्व यहीं तक सीमित नहीं है। उन्नत तकनीक की बदौलत यहां विभिन्न किस्मों के क्रूड का शोधन किया जा सकता है। इनमें भारी और अधिक सल्फर वाला क्रूड भी शामिल है, जिसे उपयोगी और मूल्यवान ईंधन में बदलना कई रिफाइनरियों के लिए मुश्किल होता है। जब युद्ध और प्रतिबंधों के कारण आपूर्ति के स्थापित मार्ग बाधित हो जाते हैं, तब अलग-अलग किस्म के कच्चे तेल को शोधित करने की यह क्षमता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वजह है कि तेल शोधन क्षमता को भी रणनीतिक बुनियादी ढांचे का हिस्सा माना जाना चाहिए। कच्चे तेल और डीजल का एक बैरल समान नहीं होते। कच्चे तेल को पहले परिवहन के जरिये रिफाइनरी तक पहुंचाना पड़ता है और फिर उसका शोधन करके पेट्रोलियम उत्पाद तैयार किए जाते हैं। अलग-अलग रिफाइनरियां इन ईंधनों का उत्पादन अलग-अलग अनुपात में करती हैं। कच्चे तेल के भंडार होने का यह मतलब नहीं कि डीजल भी उपलब्ध होगा। तेल उत्पादन जारी रहने के बावजूद शोधन प्रक्रिया या आपूर्ति के परिवहन में बाधा आने से ईंधन की किल्लत पैदा हो सकती है। अब हम समझ सकते हैं कि अमेरिका की दिलचस्पी जामनगर में क्यों है। यह ईरान युद्ध से उपजी स्थितियों और वेनेजुएला के तेल भंडारों में भारी मात्रा में मौजूद कच्चे तेल का मिला-जुला समीकरण है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस बात में दिलचस्पी दिखाई है कि रिलायंस वेनेजुएला के कच्चे तेल की अधिक मात्रा में रिफाइनिंग करे। उन्होंने वेनेजुएला के तेल उत्पादन में रिलायंस की संभावित भागीदारी पर भी चर्चा की है। वेनेजुएला में तेल उत्पादन बढ़ने से अमेरिका के आपूर्ति स्रोतों में विविधता आ सकती है। वहीं रिलायंस को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अपनी रिफाइनरी के अनुकूल क्रूड मिलने से उसके कामकाज में भी लचीलापन आ सकता है। वैसे इन संभावनाओं का साकार होना व्यावसायिक शर्तों और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर है। जामनगर में उत्पादन को अनिश्चितकाल तक नहीं बढ़ाया जा सकता। रिफाइनरियों के संचालन की अपनी तकनीकी सीमाएं होती हैं। वहीं कच्चे तेल की खरीद उसकी कीमतों, ढुलाई के खर्च, अनुबंधों और प्रतिबंधों पर निर्भर करती है। भारत ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने और बाजार पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन वह दुनिया में तेल की कीमतें तय नहीं कर सकता। तेल उत्पादन, मांग, परिवहन और भू-राजनीतिक घटनाक्रम इस मामले में निर्णायक हैं। रूस से जुड़ा पहलू अमेरिकी नीति के अंतर्विरोधों को उजागर करता है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदा, क्योंकि उसके लिए किफायती कीमतों पर तेल की उपलब्धता और आपूर्ति की सुरक्षा जरूरी थी। अमेरिका ने प्रतिबंधों का दबाव बनाकर और टैरिफ लगाने की धमकियां देकर इस पर आपत्ति जताई। लेकिन अब वही अमेरिका भारत की तेल शोधन क्षमता के रणनीतिक महत्व को स्वीकार रहा है। यह अमेरिकी नीति की परस्पर प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं को दर्शाता है- विरोधियों पर दबाव बनाना और व्यावसायिक अवसरों का लाभ उठाते हुए घरेलू बाजार में कीमतें स्थिर रखना। हमें इन तमाम अंतर्विरोधों के बीच ही अपनी राह बनानी होगी। न तो हर बात का बिना सोचे-समझे विरोध करना हमारे हित में होगा और न ही बिना सवाल किए हर मांग मान लेना। जरूरत है रणनीतिक धैर्य के साथ व्यावहारिक स्तर पर लचीलापन अपनाने की। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब यह नहीं है कि भारत अपने रुख में किसी भी तरह के बदलाव से इनकार कर दे। इसका अर्थ है यह स्वतंत्रता बनाए रखना कि हमें कब, कहां और किस तरह अपने रुख में बदलाव करना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रभाव अब तेजी से उन क्षमताओं पर निर्भर करेगा, जिनका विकल्प तलाशना दूसरे देशों के लिए मुश्किल हो। चीन ने मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ाकर ऐसा ही किया था। एनर्जी-डिप्लोमेसी का दायरा अब केवल कच्चे तेल की खरीद तक सीमित नहीं है। इसमें निवेश, टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग भी शामिल हैं। भारत में जामनगर के अलावा वाडीनार, कोच्चि, पारादीप, पानीपत और मंगलुरु में भी तेल रिफाइनरियां हैं। ये अंतरराष्ट्रीय ईंधन आपूर्ति शृंखलाओं में हमारी स्थिति को मजबूत बना सकती हैं। जामनगर ही नहीं, हमारे समूचे तेल रिफाइनिंग उद्योग के सामने बड़े अवसर हैं। हमारे सामने बड़े अवसर हैं…
भारत में जामनगर के अलावा वाडीनार, कोच्चि, पारादीप, पानीपत और मंगलुरु में भी तेल रिफाइनरियां हैं, जिनकी क्षमताओं का विस्तार किया जा रहा है। ये सब मिलकर अंतरराष्ट्रीय ईंधन आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की स्थिति को मजबूत बना सकती हैं। केवल जामनगर ही नहीं, बल्कि भारत के समूचे तेल रिफाइनिंग उद्योग के सामने बड़े अवसर हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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