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बचपन में पिता का उदासीन रवैया सिर्फ भावनात्मक दूरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह बच्चों के शरीर के भीतर ऐसी अदृश्य छाप छोड़ सकता है जो उन्हें आगे चलकर गंभीर बीमारियों से लड़ने में कमजोर बना देती है। पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी की ताजा स्टडी बताती है कि शुरुआती वर्षों में पिता की परवरिश का तरीका बच्चों के दिल और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकता है। हेल्थ साइकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक जिन बच्चों के पिता शिशु अवस्था में कम संवेदनशील और कम ध्यान देने वाले थे, उनमें 7 साल की उम्र तक इंफ्लेमेशन और ब्लड शुगर के असामान्य स्तर जैसे संकेत पाए गए,ये वही संकेत हैं जो आगे चलकर हार्ट और डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं। इस स्टडी ने उस धारणा को चुनौती दी है, जिसमें माताओं को ही बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास का सबसे बड़ा कारक माना जाता था। शोधकर्ताओं ने 292 परिवारों पर 7 साल तक नजर रखी और पाया कि जिन बच्चों के शैशव काल में पिता कम संवेदनशील थे, उन्हें आगे चलकर समस्याएं हुईं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि मां के व्यवहार का बच्चों के दिल की सेहत पर वैसा असर नहीं दिखा, जैसा पिता के व्यवहार से दिखा। स्टडी के लेखक एल्प आयतुग्लू कहते हैं, हमें उम्मीद थी कि माता-पिता, दोनों का व्यवहार असर डालेगा, पर स्टडी में पिता का व्यवहार ही असरकारी रहा। यह तथ्य चौंकाने वाला था। शोधकर्ताओं ने इसे ‘पिता की संवेदनशीलता’ से जोड़ा है। इसके अनुसार पिता पारिवारिक तनाव पर ज्यादा भावनात्मक प्रतिक्रिया देते हैं, इसका असर बच्चों तक पहुंच सकता है। ओहायो यूनिवर्सिटी की प्रो. सारा सुलिवन कहती हैं,‘बच्चे सामान्यतः मां के संग अधिक समय बिताते हैं, इसलिए पिता के साथ रहते हुए उनके व्यवहार को ज्यादा नोटिस करते हैं। यही वजह है कि पिता का सकारात्मक या नकारात्मक रवैया बच्चों पर गहरा असर डालता है। ऐसे में जरूरी है कि फैमिली लीव नीति में बदलाव कर दोनों माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताने का मौका दिया जाना चाहिए। घर खर्च उठाना, अनुशासन रखने से ज्यादा है पिता की भूमिका नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ग्रेग मिलर कहते हैं, ‘स्टडी में दिलचस्प पैटर्न सामने आया। जो पिता शुरुआत में अपने बच्चों के प्रति उदासीन या कठोर थे, वे बाद में ‘सह-पालन’ में भी पिछड़ गए। वे अक्सर बच्चे का ध्यान खींचने के लिए मां से मुकाबला करने लगते और हार मानकर पीछे हट जाते। इस शोध ने बड़ी लकीर खींच दी है। स्पष्ट हो गया है कि पिता की भूमिका घर खर्च उठाना या अनुशासन रखना नहीं है। उनका प्यार भरा स्पर्श जादू जगा सकता है। यानी स्वस्थ समाज की नींव पिता की उसी संवेदनशीलता में छिपी है, जो वह अपने 10 माह के बच्चे को खिलौना पकड़ते समय दिखाता है।’
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