न्यूयॉर्क46 मिनट पहले
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छात्र सेमेस्टर भर निभाते हैं प्रकृति से रिश्ता।- सिम्बॉलिक इमेज
कल्पना कीजिए, समय का एक बड़ा हिस्सा दो जीवों को जोड़ने के लिए समर्पित है, एक आप (इंसान) और दूसरा पेड़ (जो आप नहीं हैं)। ’ ये किसी कविता की पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि कोर्स का सिलेबस है, जो हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने शुरू किया है, नाम है- ‘ट्री’ यानी पेड़। आज की भागदौड़ भरी डिजिटल जिंदगी में जहां आंखें स्क्रीन पर और अंगुलियां की-बोर्ड पर टिकी रहती हैं, वहां यह कोर्स गैजेट मुक्त अविस्मरणीय अनुभव दे रहा है। इस कोर्स की पढ़ाई बंद कमरे या लैब में नहीं होती, न ही यहां भारी-भरकम बॉटनी की किताबें रटनी पड़ती हैं। यहां असली ‘प्रोफेसर’ इंसान नहीं, बल्कि ‘पेड़’ हैं। कोर्स की शुरुआत हार्वर्ड के अर्नोल्ड आर्बोरिटम (ट्री म्यूजियम) के डायरेक्टर व डेवलपमेंटल बायोलॉजिस्ट विलियम फ्रीमैन ने की।
लेकिन वे खुद को पारंपरिक अर्थों में प्रोफेसर नहीं मानते। उनका मानना है कि पेड़ ही छात्रों को सबसे गहरी सीख देते हैं- जुड़ाव, धैर्य और मिलजुलकर रहने की। हर साल फर्स्ट ईयर के छात्र इस कोर्स से जुड़ते हैं। पहले दिन पूरी क्लास 281 एकड़ में फैले आर्बोरिटम में घूमने जाती है। यहां मौजूद 16 हजार से ज्यादा पेड़ों में से हर छात्र को एक पेड़ चुनना होता है- ऐसा पेड़ जो पूरे सेमेस्टर उसका साथी बनता है। वही पेड़ उसके साप्ताहिक असाइनमेंट व अंतिम प्रोजेक्ट का विषय होता है।
छात्र जैकब किफ्लू ने ‘लिलैक’ का पेड़ चुना। वह कहते हैं,‘मुझे ऐसा पेड़ चाहिए था जो घर जैसा महसूस कराए। यह शायद सबसे सुंदर नहीं है, पर इसके नीचे बैठकर सुकून मिलता है।’ स्टेला ने जापानी मेपल का पेड़ चुना। वे कहती हैं,‘मुझे कॉलेज आए तीन महीने हुए हैं। मैंने यहां कई दोस्त बनाए हैं, लेकिन मेरा सबसे गहरा रिश्ता इस पेड़ से है। मैं इसके बारे में अपने दोस्तों से ज्यादा जानती हूं।’ डॉ. फ्रीमैन कहते हैं,‘सिलेबस की एक लाइन इस पूरी कोशिश का सार है- अपने पेड़ को महज अपना विस्तार न समझें, उसे स्वतंत्र जीव के रूप में देखें और उसे समझने के लिए जुनूनी हो जाएं। यह प्रयोग हमें याद दिलाता है कि स्क्रीन से बाहर भी एक दुनिया है, जो शांत है, जीवित है और हमें बहुत कुछ सिखाने का इंतजार कर रही है।
महान कवियों-लेखकों की रचनाओं से भी रूबरू होते हैं छात्र
डॉ. फ्रीमैन कहते हैं, ‘हम अनजाने में दूसरी प्रजातियों को खत्म कर रहे हैं। इस कोर्स का मकसद छात्रों में ‘सहानुभूति’ जगाना है। इस दौरान छात्र सिर्फ शोध पत्र ही नहीं पढ़ते, बल्कि महान कवियों और लेखकों की रचनाएं भी पढ़ते हैं। वे डार्विन के हाथ से लिखे पत्र व कार्सन मैकुलर्स की कहानियों से जुड़ते हैं। यह कोर्स सिखाता है कि किसी ऐसी चीज से प्यार करना कैसा होता है जो बदले में आपको प्यार नहीं दे सकती। वे कहते हैं,‘यह विज्ञान की नहीं, दिल की कक्षा है। मुझे खुशी होती है जब छात्र पेड़ों को गले लगाते हैं या दोस्तों को उनसे मिलवाने लाते हैं- यह वह जुड़ाव है जो डिजिटल स्क्रीन से संभव नहीं।’









