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18 महीने की एल्सी… जन्म से ही देख नहीं सकती। बीच-बीच में सांस लेना बंद कर देती है। वह दुर्लभ जीन म्यूटेशन ‘आरएआरबी’ से जूझ रही है। दुनिया में इस विकार के 100 से भी कम मामले हैं। डॉक्टर्स और परिजनों को एल्सी के बचने की उम्मीद जरा भी नहीं थी… पर उसे जन्म देने वाली मां कैसे हार मान लेती। क्रिस्टेल रैंडल न सिर्फ बेटी को मौत के मुहाने से वापस ले आईं बल्कि जीन थेरेपी से बीमारी का असर घटाने में जुटी हैं, पढ़िए क्रिस्टेल का संघर्ष उन्हीं के शब्दों में… ‘मैंने फिल्मी दुनिया के बड़े-बड़े प्रचार अभियानों का नेतृत्व किया है, कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों को ऑस्कर तक पहुंचाया है। पर 50 की उम्र में मेरा सबसे बड़ा अभियान फिल्म नहीं, बल्कि अपनी बेटी एल्सी की जिंदगी को बचाने के लिए है। मेरे लिए मां बनने का सफर आसान नहीं रहा। आईवीएफ की कई विफल कोशिशों के बाद 48 वर्ष की उम्र में डोनर एग की मदद से मैं गर्भवती हुई। मार्च 2025 में सिजेरियन के बाद खुशियां पलभर में चिंता में बदल गईं, जब एल्सी ने जन्म लेते ही सांस नहीं ली। डॉक्टरों ने कृत्रिम सांस देकर संभाला। इसके बाद अस्पताल जिंदगी का हिस्सा बन गया। जांच में पता चला कि एल्सी की आंखें विकसित नहीं थीं, फेफड़े छोटे थे और दिल में दो छेद थे। यह हमारे संघर्ष की शुरुआत भर थी। जांच में पता चला कि वह दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल विकार से ग्रस्त है, जिसकी आशंका 16 करोड़ 30 लाख में से एक होती है। एल्सी को मेडिकली दृष्टिहीन घोषित कर दिया गया। सबसे डरावना लक्षण था बार-बार उसकी सांस रुकना। परेशान होते ही वह नीली पड़ जाती और मिनटों तक सांस नहीं ले पाती। हर बार उसकी जान बचाने के लिए तुरंत ऑक्सीजन सपोर्ट देना पड़ता था। एल्सी के जीवन के शुरुआती आठ महीने अस्पताल में ही बीते। किसी को भी उसके ठीक होने की उम्मीद नहीं थी, तो हमने तो अस्पताल में ही उसका नामकरण संस्कार करा दिया। पर एल्सी ने हार नहीं मानी। उसने हर मुश्किल पार की और वेंटिलेटर के बिना, सिर्फ ऑक्सीजन के सहारे सांस लेना सीख लिया। संघर्ष बढ़ता रहा, पर मैं थमी नहीं इस साल फरवरी में एल्सी के घर लौटने पर संघर्ष का नया दौर शुरू हुआ। ट्रेंड केयर वर्कर होने पर भी मैं 5 मिनट के लिए बाहर नहीं जा सकती थी। कई लोगों ने नौकरी छोड़ने की सलाह दी, पर मैं जानती थी कि काम करना स्वार्थ नहीं, बल्कि भारी तनाव में मानसिक रूप से संभले रहने का सहारा था। मैंने हार नहीं मानी, सिस्टम से लड़कर रास्ता बनाया। एल्सी अब दुनिया को आंखों से नहीं, बल्कि आवाजों, स्पर्श और स्वाद से महसूस करती है। खुश होने पर वह जीभ बाहर निकालकर हवा को चखने की कोशिश करती है, चेहरों पर हाथ फेरते हुए खिलखिला उठती है… समुद्र की लहरों की आवाज सुनकर मुस्कुरा देती है। मैं अब ऐसी जीन थेरेपी पर ध्यान दे रही हूं, जो इस बीमारी के असर को धीमा या कम कर सके। दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे पैरेंट्स के लिए पॉडकास्ट भी रिकॉर्ड करती हूं। एल्सी के दिल के छेद भर चुके हैं और अब वह फूड पाइप के बजाय चम्मच से खाना खाती है। अगर मुझसे पूछा जाए कि क्या मैं यह रास्ता फिर चुनती, तो मेरा जवाब होगा, हां। बेटी के साथ जुड़ी हर छोटी खुशी मेरी सबसे बड़ी जीत है।’ -क्रिस्टेल
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