91 की उम्र में ट्रेकिंग के रिकॉर्ड बना रहे डेल:  बुलीइंग से तंग आकर शुरू की थी दौड़; हर चुनौती पर कहते हैं- गिरना नहीं है
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91 की उम्र में ट्रेकिंग के रिकॉर्ड बना रहे डेल: बुलीइंग से तंग आकर शुरू की थी दौड़; हर चुनौती पर कहते हैं- गिरना नहीं है

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न्यू हैम्पशायर के ‘व्हाइट माउंटेंस’ की सीधी, पथरीली चढ़ाई के सामने खड़ा होता हूं, तो गहरी सांस लेकर खुद से बस एक ही बात कहता हूं… आज के दिन बस ‘गिरना नहीं है।’ 91 साल के डेल सैंडर्स कहते हैं, अपनी बूढ़ी और सिकुड़ती पीठ पर जब मैं छोटा सा बैग टांगता हूं, तो मुझे अपनी उम्र का एहसास नहीं होता। ट्रेकिंग की दुनिया में ‘ग्रे बियर्ड’ के रूप में चर्चित डेल 3525 किमी के जानलेवा सफर पर दोबारा निकल पड़े हैं। आखिर क्या वजह है इस जुनून की और कहां से मिलती है इस उम्र में इतनी ऊर्जा? जानिए डेल से…

‘लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि इस उम्र में, जब शरीर आराम मांगता है, मैं 3525 किमी के इस ‘अप्पलाचियन ट्रेल’ पर दोबारा क्यों हूं? मैं क्यों अपनी जान जोखिम में डाल रहा हूं? इसका सीधा सा जवाब है… मैं खुद को जिंदा महसूस करना चाहता हूं। मेरे लिए यह सिर्फ ट्रेकिंग नहीं, यह अपनी सीमाओं से मेरी जंग है। 2017 में, 82 साल की उम्र में मैंने पहली बार इस ट्रेल को फतह किया था और दुनिया के सबसे उम्रदराज ‘थ्रू-हाइकर’ होने का रिकॉर्ड बनाया था। पर 2021 में मेरे ही दोस्त, एमजे एबरहार्ट (87) ने मेरा वह रिकॉर्ड तोड़ दिया। कई लोग सोचते होंगे कि मुझे दुख हुआ होगा, पर सच तो यह है कि मैं खुद उसके साथ आखिरी कुछ मील चला ताकि वह हार न माने और यह रिकॉर्ड बनाए। लेकिन जैसे ही मुकाम हासिल हुआ, मेरे भीतर का बच्चा फिर जाग उठा, मुझे मेरा रिकॉर्ड वापस चाहिए था। मेरे इस जुनून की वजह बचपन का संघर्ष भी है। पढ़ाई में औसत था इसलिए साथी मजाक उड़ाते थे। मुझे अकेला छोड़ देते थे और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे। इसी बुलीइंग से तंग आकर मैंने खेल के मैदान पर दौड़ना और पसीना बहाना शुरू किया। तब महसूस हुआ कि भले ही पढ़ाई में पीछे हूं, लेकिन शारीरिक क्षमता और स्टेमिना में किसी से भी आगे निकल सकता हूं। 80वें जन्मदिन पर मैंने मिसिसिपी नदी को अकेले पार करने का रिकॉर्ड बनाया था। मैं किसी और को हराने के लिए नहीं, बल्कि खुद को यह साबित करने के लिए निकला हू‍ं कि उम्र महज संख्या है। मैं अपने रिकॉर्ड को चुनौती देना चाहता हूं। जब आप जीवन के दसवें दशक में होते हैं, तो हर दिन नई चुनौती बन जाता है। पिछले हफ्ते भयानक तूफान में एक केयरटेकर ने कहा,‘डेल, आगे बढ़े तो मर जाओगे।’ पर कदम नहीं रुके। घने कोहरे व बर्फीली बारिश में चट्टानों पर रेंगते हुए मुझे महसूस होता है कि 82 वाली उम्र की तुलना में 91 की उम्र में यह चढ़ाई दोगुनी कठिन है। रास्ते में युवा ट्रेकर्स मुझसे मिलते हैं, सेल्फी लेते हैं और कहते हैं कि मैं उनकी प्रेरणा हूं, तो गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है। उनकी आंखों की चमक थकान मिटाकर उत्साह भर देती है। आगे मेन राज्य का 160 किमी लंबा घना और दुर्गम जंगल मेरा इंतजार कर रहा है, जहां न मदद मिलेगी, न जरूरी सामान। फिर भी भरोसा है कि मैं यह चुनौती पूरी करूंगा। इसके बाद भी सफर नहीं रुकेगा। मैं नए लक्ष्य और नए रिकॉर्ड की तलाश में हूं। जब तक सांसें चलती रहेंगी और शरीर साथ देगा, मैं आगे बढ़ता रहू‍ंगा, संघर्ष करता रहूंगा और हर बार खुद को ही नई चुनौती देता रहूंगा।’



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