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अब चार साल की हो चुकी नैन्सी और मार्गो स्कूल जाने की तैयारी कर रही हैं। लेकिन गर्भ में रहते हुए उनकी जिंदगी पर बड़ा संकट था। दोनों एक ही प्लेसेंटा से जुड़ी थीं और एक दुर्लभ बीमारी ट्विन-टू-ट्विन ट्रांसफ्यूजन सिंड्रोम (टीटीटीएस) के कारण एक बच्ची को जरूरत से ज्यादा और दूसरी को बहुत कम खून मिल पा रहा था। इससे दोनों की जान को खतरा था। चार साल पहले हुए अनोखे ट्रायल का अब एक रिसर्च रिपोर्ट में खुलासा हुआ है। लंदन के क्वीन शार्लोट्स एंड चेल्सी हॉस्पिटल और इंपीरियल कॉलेज हेल्थकेयर ट्रस्ट के डॉक्टरों ने बिना किसी सर्जरी के हाई-फोकस्ड अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल किया। इसमें शरीर के बाहर से भेजी गई ध्वनि तरंगों (साउंडवेव) से प्लेसेंटा की लगभग 2 मिलीमीटर चौड़ी खून की नसों को गर्म करके बंद किया। यह प्रक्रिया करीब 20 मिनट में पूरी होती है और मां के पेट में सुई या कैमरा डालने की जरूरत नहीं पड़ती। दर्द भी नहीं होता। अमेरिकन जर्नल ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी की रिपोर्ट के अनुसार, टीटीटीएस सिर्फ उन समान जुड़वां में होती है, जो एक ही प्लेसेंटा से जुड़े होते हैं। इस वजह से एक को कम, दूसरे को ज्यादा खून मिलता है। इससे एक बच्चे के हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जबकि दूसरा जरूरत से कम पोषण और ऑक्सीजन मिलने से कमजोर हो जाता है। इससे दोनों की जान को खतरा होता है। भ्रूण चिकित्सा विशेषज्ञ प्रो. क्रिस्टोफ लीस का कहना है कि साउंडवेव तकनीक उन महिलाओं के लिए बड़ी राहत है, जिन्हें अभी तक जटिल सर्जरी से गुजरना पड़ता है। वहीं ट्विन्स ट्रस्ट की हेल्थकेयर प्रमुख हेलेन पेक के अनुसार, यदि इस तकनीक से बीमारी का शुरुआती चरण में सुरक्षित इलाज संभव हुआ तो यह गर्भ में जुड़वां गर्भस्थ बच्चों की जिंदगी बचाने में बड़ा बदलाव ला सकता है। नैन्सी और मार्गो की मां ब्रियोनी गैरेट आज दोनों बेटियों को दौड़ते-खेलते देखती हैं, तो उन्हें हर दिन उस फैसले की याद आती है, जिसने दो नन्हीं बच्चियों को हंसी-खुशी जिंदगी दी है। जुड़वां बच्चों को जीवन देने में बड़े बदलाव की उम्मीद दुनिया में जुड़वां गर्भधारण के करीब 15% मामलों में टीटीटीएस की समस्या होती है। ब्रिटेन में हर साल करीब 400 जुड़वां गर्भस्थ बच्चों में यह बीमारी होती है। अपोलो अस्पताल की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल करीब 20,000 जुड़वां गर्भावस्थाएं होती हैं। इनमें से 5,000 एक ही प्लेसेंटा वाले होते हैं और 750 में टीटीटीएस होती है। इस नई तकनीक से ऐसे बच्चों की जिंदगी बच सकेगी।
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