तर्कों की जंग में ‘साझा सिरा’ ही है असली जीत:  एक्सपर्ट का मत- ‘एग्री टू एग्री’ के जरिए साझा जमीन खोजिए, जहां से बड़े बदलाव शुरू होते हैं
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तर्कों की जंग में ‘साझा सिरा’ ही है असली जीत: एक्सपर्ट का मत- ‘एग्री टू एग्री’ के जरिए साझा जमीन खोजिए, जहां से बड़े बदलाव शुरू होते हैं

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आपने कभी गौर किया है कि जब भी किसी मुद्दे पर बहस गर्म होती है, तो हम अक्सर यह कहकर बात खत्म कर देते हैं-‘चलिए, इस बात पर सहमत होते हैं कि हम एक-दूसरे से सहमत नहीं हैं’ (एग्री टू डिसएग्री)…। आज की ध्रुवीकृत दुनिया में, जहां लोग अपने-अपने वैचारिक कोनों में दुबक गए हैं, अमेरिकी एड काउंसिल की प्रेसिडेंट और सीईओ लिसा शर्मन एक क्रांतिकारी विचार लेकर आई हैं। वे कहती हैं कि हमें ‘एग्री टू डिसएग्री’ के बजाय ‘एग्री टू एग्री’ का रास्ता चुनना चाहिए। यानी, मतभेदों पर बात बंद करने के बजाय, उन बिंदुओं से चर्चा शुरू करें जहां हम पहले से एक-दूसरे से सहमत हैं। लिसा के अनुसार, किसी भी जटिल सामाजिक मुद्दे को हल करने की कुंजी वह ‘साझा जमीन’ है, जो हम सबके बीच पहले से मौजूद है। उन्होंने इसे अमेरिका के सबसे विवादित मुद्दे ‘बंदूक हिंसा’ के उदाहरण से समझाया है। अमेरिका में पिछले चार वर्षों से बच्चों और किशोरों की मौत का सबसे बड़ा कारण गन रही हैं। यह मुद्दा इतना संवेदनशील है कि लोग इस पर बात करने से भी कतराते हैं। पर रिसर्च अलग ही कहानी बयां करती है। एड काउंसिल के सर्वे में पाया गया कि बंदूक रखने वाले 80% परिवार इस बात पर सहमत हैं कि हथियारों का सुरक्षित रखरखाव जान बचा सकता है। वहीं, 10 में से 8 अमेरिकी मानते हैं कि सार्थक बातचीत से बच्चों की मौत रोकी जा सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो, भले ही हमारे रास्ते अलग हों, लेकिन हम सब एक बात पर ‘सहमत’ हैं कि बच्चों की जान बचाना जरूरी है। लिसा मानती हैं कि हम सब बदलाव लाने की क्षमता रखते हैं। यह तब होता है जब हम सुनने, जुड़ने और साथ मिलकर काम करने का विकल्प चुनते हैं। जब हम उस साझा आधार पर ‘सहमत होने के लिए सहमत’ होते हैं, जो हमारे पास पहले से है, तभी हम सहयोग और बड़े समाधानों का रास्ता साफ कर पाते हैं… तो अगली बार जब किसी से बहस हो, तो यह मत खोजिए कि आप कहां अलग हैं, बल्कि वह सिरा पकड़िए जहां आप और वो एक ही बात सोच रहे हैं। बातचीत वहीं से शुरू होगी। समझदारी इसी में,हम असहमति का इस्तेमाल कैसे करते हैं लिसा कहती हैं… ‘एग्री टू एग्री’ मॉडल का मतलब यह नहीं है कि हम मतभेदों को खत्म कर दें। असहमति तो हर रिश्ते में अनिवार्य है- चाहे वह पति-पत्नी हों, दोस्त या सहकर्मी। हम काम शुरू करने के लिए शत-प्रतिशत वैचारिक समानता का इंतजार करेंगे, तो विकास का पहिया कभी घूमेगा ही नहीं। असली समझदारी इसी में है कि हम असहमति का इस्तेमाल कैसे करते हैं। एक सच्ची साझेदारी में, अलग-अलग विचार हमें अपनी कमियों को पहचानने और नए नजरिए से सोचने में मदद करते हैं। जब हम साझा बिंदुओं को ‘मंजिल’ के बजाय ‘शुरुआत’ मानते हैं, तो चर्चा का वही इंजन हमें स्पष्ट और प्रभावशाली समाधानों की ओर ले जाता है।



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