एन. रघुरामन का कॉलम:  कठिन समय में लागत और संचालन खर्चों की कटौती पर विचार करना चाहिए
टिपण्णी

एन. रघुरामन का कॉलम: कठिन समय में लागत और संचालन खर्चों की कटौती पर विचार करना चाहिए

Spread the love




कृपया मेरी आदतों को मत कोसिए। मैं पुराने ख्यालों का आदमी हूं। विंडो शॉपिंग में भी मैं पहले प्राइस टैग देखता हूं, फिर प्रोडक्ट का मजा लेता हूं। पिछले हफ्ते मुंबई के घाटकोपर स्थित एक मॉल में किसी का इंतजार करते हुए मैं स्मार्ट बाजार में चला गया। दाखिल होते ही मेरा स्वागत किचन और बाथरूम से जुड़ी चीजों ने किया, जैसे फिनाइल, डिश वॉशिंग सोप, लिक्विड और अन्य डिटर्जेंट। मैंने फिनाइल की एक बोतल उठाई और कीमत देखकर चौंक गया। उस ब्रांडेड फिनाइल बोतल की कीमत 307 रुपए थी। मैंने तुरंत घर फोन कर पुरानी फिनाइल की बोतल पर छपी कीमत पूछी। पुरानी कीमत ने मुझे और बड़ा झटका दिया। वह 199 रुपए की ही थी। मैंने दिमाग में उन सभी सफाई उत्पादों की कीमतें नोट कर लीं, जिनके मुख्य घटक कच्चे तेल से मिलने वाले पेट्रोलियम केमिकल्स या नैफ्था से बनते हैं। उत्पादों से नजरें हटा कर फिर मैंने उस बड़े स्टोर में मौजूद लोगों को देखा। मैं ही नहीं, बल्कि महीने का राशन लेने आए ज्यादातर लोग कीमतों को लेकर हैरान थे। मैंने उनमें एक समान व्यवहार देखा। कीमतों में वृद्धि से बजट पर बढ़ते दबाव के कारण ज्यादातर ग्राहक अपने पसंदीदा ब्रांड को छोड़कर उसी शेल्फ पर रखे सस्ते विकल्प लेने को तैयार हैं। बढ़ती कीमतें हम मध्यमवर्गीयों के खर्च के तरीके को ही नहीं, बल्कि इस नजरिये को भी बदल रही हैं कि हम किस पर खर्च करना चाहते हैं। कम उम्र की महिलाएं और कम आय वाले ग्राहक ब्रांड लॉयल्टी छोड़ने के लिए ज्यादा तैयार दिखे। एक महिला अपने पति से कह रही थीं कि चूंकि नैफ्था से बनने वाले बायोडिग्रेडेबल बैग्स की कीमत दोगुनी हो गई है तो वे ऑनलाइन शॉपिंग में आने वाले पेपर बैग ही कचरे के लिए इस्तेमाल करेंगे। हालांकि पर्सनल केयर उत्पादों में बहुत कम लोग अपनी पसंद बदल रहे थे, लेकिन सफाई उत्पादों में लगभग सभी लोग कम चर्चित ब्रांड खरीदने से नहीं हिचक रहे थे। घर लौटने पर मेरी बात एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी के मालिक से हुई, जिनके मेडिकल और नर्सिंग कॉलेज के साथ अन्य संस्थान भी हैं। मैंने हिचकते हुए अपनी यह मामूली-सी खोज उनसे साझा की। उनकी आवाज में ऐसा उत्साह दिखा, जैसे मैंने उनकी बड़ी समस्या का हल खोज लिया हो। उन्होंने मुझे होल्ड पर रखा और दूसरे फोन से फार्मेसी विभाग के प्रमुख को कॉल कर यूनिवर्सिटी में इस्तेमाल होने वाले फिनाइल और अन्य सफाई उत्पादों का विकल्प तैयार करने को कहा। दरअसल, होस्टल कैंटीन में इस्तेमाल होने वाले बर्तन धोने के पाउडर और लिक्विड सहित कई सफाई उत्पादों पर हर साल लाखों रुपए खर्च होते हैं। मैंने फार्मेसी विभाग के प्रमुख को यह सुझाव देते हुए सुना कि बड़े परिसरों में सोडियम सल्फेट, एसएलईएस (सोडियम लॉरिल ईथर सल्फेट) और पानी का मिश्रण काम आ सकता है। इसमें कीटाणुनाशक के रूप में आइसोप्रोपाइल अल्कोहल मिला दें तो फर्श जल्दी सूखता है और महंगे ब्रांडेड फिनाइल के बिना बैक्टीरिया भी मर जाते हैं। पाइन ऑइल, पानी और इमल्सीफायर को मिलाकर एक साधारण कीटाणुनाशक बनाया जा सकता है। इससे 307 रुपए से बहुत कम कीमत पर वही चिर-परिचित खुशबू और सफाई मिलती है। इससे मुझे अचानक अपना बचपन याद आ गया, जब हम रीठा इस्तेमाल करते थे, जो रासायनिक सर्फैक्टेंट्स का शत-प्रतिशत प्राकृतिक विकल्प है। हम बिना बीज वाले नींबू या नींबू के छिलकों को रीठा, विनेगर और सी-सॉल्ट के साथ उबाल कर चिकनाई हटाने वाला ताकतवर डिश वॉशिंग लिक्विड बनाते थे। मेरी मां सफेद विनेगर, पानी और बर्तन धोने के साबुन का थोड़ा-सा घोल मिलाकर किचन काउंटर, टाइल्स और फर्श साफ करने का असरदार स्प्रे बनाती थीं। फंडा यह है कि बड़े उद्योगों के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे जैसे सामान्य परिवारों को चलाने के खर्चे भी बढ़ते जा रहे हैं। हम सभी को इनमें कटौती कर बजट संतुलित रखने के तरीके खोजने होंगे। मुझे लिखकर बताइए कि आप अपना खर्च प्रबंधन कैसे करते हैं।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *