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एन. रघुरामन का कॉलम: किशोरावस्था के गुस्से को रिश्तों पर स्थायी दाग न छोड़ने दें

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1 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

शनिवार और रविवार की दरमियानी रात दो बजे आप किसी पब में कुछ घंटे नाचने-गाने के बाद थकी हुई घर लौटती हैं। घर पहुंचकर आप देखती हैं कि मुख्य दरवाजा अब भी खुला है। अंदर घुसते हुए आप बड़बड़ाती हैं- “गैर-जिम्मेदाराना’! लेकिन असल कहानी यह नहीं है।

असल कहानी यह है कि आपके पिता ने हॉल की खिड़की से आपको अपने दोस्त की बाइक या टैक्सी से उतरते हुए देख लिया था। वे रात के दो बजे आपसे कोई चर्चा नहीं करना चाहते थे। लेकिन शाम आठ बजे जब आप घर से निकली थीं, तभी से उनकी नजरें दरवाजे पर ही लगी थीं।

वे अपनी प्यारी बेटी के लौटने का इंतजार कर रहे थे। जब आप आखिरकार सकुशल घर पहुंचीं, तो उनकी आंखों से आंसू बह निकले। वह राहत की एक शांत नि:श्वास थी। उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और सोने चले गए। लेकिन वे अभी सोए नहीं हैं।

शायद वे इंतजार कर रहे हैं कि आप उनके कमरे का दरवाजा खटखटाएं और कहें- “सॉरी डैड, मुझे देर हो गई’। लेकिन इसके बजाय आप अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेती हैं और रविवार की दोपहर तक सोती रहती हैं, जबकि पिता सुबह छह बजे ही उठकर सप्ताहांत के जरूरी काम निपटाने में लग चुके होते हैं।

कई परिवारों में सप्ताहांत कुछ इसी तरह गुजरते हैं। बच्चे को लगता है कि माता-पिता उसकी आजादी में दखल दे रहे हैं। माता-पिता को लगता है कि बच्चा उनकी चिंता को समझ ही नहीं पा रहा। और इसके बीच प्यार, गुस्से की परतों के नीचे कहीं दब-सा जाता है।

मुझे हाल ही में भोपाल में आयोजित एक इंडक्शन कार्यक्रम के दौरान एहसास हुआ कि माता-पिता और बच्चों के बीच यह दूरी कितनी व्यापक हो चुकी है। मैंने वहां बच्चों से पूछा कि जिनको लगता है कि अपने पैरेंट्स, खासकर पिता के साथ उनके रिश्ते खराब हो गए हैं, वे हाथ उठाएं।

मुझे उम्मीद थी कि कुछ हाथ उठेंगे। लेकिन सैकड़ों हाथ एक साथ उठ गए। वह दृश्य भूलना मुश्किल था। ये ऐसे बच्चे नहीं थे, जिन्होंने अपने पिता से प्यार करना बंद कर दिया था। ये बस उस उम्र में पहुंच चुके थे, जहां माता-पिता की हर सलाह उन्हें दखलअंदाजी लगने लगती है। वहीं किशोरावस्था में स्वच्छंदता का हर कृत्य माता-पिता को खतरे की तरह दिखाई देने लगता है।

12 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चों का अपने माता-पिता से झगड़ना स्वाभाविक है। यह बड़े होने की प्रक्रिया का हिस्सा है। वे आजादी चाहते हैं, निजता चाहते हैं और अपने फैसले खुद लेने का अधिकार चाहते हैं। जबकि माता-पिता अब भी अपने कंधों पर उनके संरक्षण की जिम्मेदारी लिए होते हैं।

मैंने कुछ नोटबुक्स में लिखा देखा- “आई हेट माय फादर’। शायद उस छोटे बच्चे ने यह नहीं सोचा होगा कि अगर उसके पिता ने अनजाने में ये शब्द पढ़ लिए तो उन पर क्या गुजरेगी। जिन माता-पिता ने बच्चों के लिए वर्षों तक अपनी सुविधाओं, पैसों, नींद और कई बार अपने सपनों तक को पीछे रखा हो, उनके लिए ऐसे शब्द उनके साथ किसी बहस से ज्यादा गहरा घाव दे सकते हैं।

वे शायद खुद से पूछें कि अपने बच्चे के लिए इतना कुछ करने के बाद क्या वो मेरे बारे में यही सोचता है? इसीलिए बच्चों को अपने गुस्से को अभिव्यक्त करते समय थोड़ा सावधान रहना चाहिए। गुस्सा अस्थायी होता है, लेकिन लिखे हुए शब्द स्थायी यादें बन सकते हैं।

माता-पिता के साथ अपने रिश्ते को सहेजकर रखने की अहमियत पर बच्चों से बात करते हुए मुझे यह सच एक बार फिर दिखाई दिया। मेरे सामने वो बच्चे थे, जो अब अपना कैम्पस जीवन शुरू करने जा रहे थे और आजादी की एक बिल्कुल नई दुनिया में कदम रखने को तैयार थे। लेकिन उनके पीछे वे माता-पिता खड़े थे, जिन्होंने उन्हें यहां तक पहुंचाया था।

बोलते-बोलते मेरी नजर कम-से-कम ऐसी 50 जोड़ी आंखों पर पड़ी, जो चुपचाप अपने आंसू पोंछ रही थीं। वर्षों तक उन्होंने अपने बच्चों का हाथ थामे रखा था। अब उनसे उनका हाथ छोड़ देने को कहा जा रहा था। शायद उन आंसुओं ने वह सब कह दिया, जो बच्चे अभी तक समझ नहीं पाए थे।

फंडा यह है कि जरूरत पड़े तो अपने माता-पिता से लड़ लीजिए। उनसे असहमति जताइए। अपनी आजादी भी मांगिए। लेकिन जब गुस्सा उतर जाए, तो वापस जाइए और उनसे सॉरी कह दीजिए। क्योंकि रात के दो बजे खुले दरवाजे के पीछे आपका इंतजार कर रहे लोग आपके दुश्मन नहीं हैं। वे वही हैं, जो यह प्रार्थना करते हैं कि आप सुरक्षित घर लौट आएं।

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