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- N. Raghuraman’s Column Life Reveals Itself Beautifully With The Realisation Of Being A Father
38 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
पैरेंटल लीव के दो सप्ताह बाद मैं काम पर लौटा था। 1990 के दशक की उस शुरुआत में मैंने खुद को रजत शर्मा और फातिमा जकारिया के साथ मीटिंग्स के दौरान एक अनजानी स्थिति में पाया। जब भी दफ्तर में फोन बजता, मुझे लगता जैसे वह मेरे लिए है। ‘क्या बच्ची सो गई?’ या ‘क्या वह ठीक है?’ या इसी तरह के विचार मेरे मन में उस नन्ही खुशी के बारे में आने लगते, जो उस समय हमारे घर आई थी।
मैं संपादकीय बैठकों में इस हद तक अनमना हो जाता था कि शर्मा और जकारिया मुझसे पूछते ‘क्या तुम ठीक हो? क्या घर पर सब दुरुस्त है?’ पिता बनना उस समय मेरे अस्तित्व की सबसे सुखद घटना थी। मैं एक साथ बहुत सारी नई चीजों के बारे में जान रहा था- धैर्य, दुर्बलता, दृढ़ता, जब बच्चा कपड़े, चादरें आदि गंदा कर देता है तो मुंह न बनाना आदि।
मेरे भीतर धीरे-धीरे एक जीवन देने वाली उदारता बढ़ रही थी। मुझे महसूस हुआ जैसे मैं बेटी को उसके जन्म से पहले से जानता था, जब मैं उसकी मां के साथ विभिन्न अपॉइंटमेंट्स में गया था और अल्ट्रासाउंड्स देखे थे, जिनमें मैंने गर्भस्थ शिशु से भौतिक दूरी के बावजूद उसके करीब रहने के तरीके खोज निकाले थे।
लगभग हर रोज ही मैं उसे छाती से लगाए घूमता था, और जैसे-जैसे हमारा रिश्ता आगे बढ़ा, मौसम बदलते रहे- पहले गर्मी से बरसात और फिर धीरे-धीरे मध्य गर्मी से सर्दी तक। मेरी पत्नी और मेरा पूरा जीवन उसके इर्द-गिर्द ही घूमता था। रोजमर्रा की गतिविधियां सबसे ज्यादा मायने रखती थीं।
बच्ची का स्पर्श, देर रात तक उसे भोजन देना, उसकी हर छोटी से छोटी आवाज के मायने निकालना और इससे पहले कि वह हमें थोड़ी देर सोने की मोहलत देती, धैर्यपूर्वक उसकी सफाई करना। इस गहन संबंध ने मुझे सिखाया कि बेटी और पिता के बीच का बंधन अपनी अटूट उपस्थिति के माध्यम से तेजी से आगे बढ़ रहा था।
एक आदर्श पिता बनने का दबाव मेरी अति-सतर्कता में प्रकट हुआ। हर घटना ने एक नई परवाह को जन्म दिया। मैंने न केवल उसे हर तालिका और दिशा-निर्देशों के अनुसार मापा, बल्कि मुझे यह भी पता था कि उसने कितने शब्द बोले! मैं उसके बारे में डेटा एकत्र करने को लेकर आविष्ट हो चुका था। और मैं एक पिता के रूप में अपनी क्षमताओं पर प्रसन्न था।
समय के साथ मैंने खुद को अधिक छूट दी और उत्कृष्टता के बाहरी मानक के बजाय उसकी स्वयं की शर्तों पर उसकी प्रगति को सराहने लगा। मैं कभी भी ‘अपनी योग्यता साबित करो’ वाली पैरेंटिंग मानसिकता के जाल में नहीं फंसा। मुझे लगा प्रामाणिक पैरेंटिंग का मतलब परफेक्शन नहीं, अपनी कमजोरियों के साथ जीना सीखना है।
किसी भी पिता की तरह मुझे भी एहसास हुआ कि पैरेंटहुड के लिए कोई नियमावली नहीं है। उस बड़ी जिम्मेदारी के साथ एक नुकसान भी आता है- अपने पूर्व के अस्तित्व और जीवन की सहज स्वतंत्रता की क्षति। जब भी मैं किसी उपन्यास के पन्नों में खोना शुरू करता, एक चीख, या खिलखिलाहट मेरा ध्यान भटका देती और मैं फिर से उस बिस्तर की ओर खिंचा चला जाता, जहां मेरी नन्ही खुशी सो रही होती थी।
दोस्तों के साथ योजना बनाना अब पहले की तरह स्वत:स्फूर्त नहीं रह गया था। बेफिक्री से भरे दिन थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए पीछे छूट गए थे। इसकी मायूसी तो थी, लेकिन पछतावा नहीं था, क्योंकि उस नन्ही परी की मुस्कान हर नुकसान की सौ गुना भरपाई कर देती थी। एक बेफिक्र ग्रेजुएट छात्र से लेकर एक पोस्ट ग्रेजुएट आशावादी पति बनने तक, मैंने पितृत्व में अपनी पीएचडी हासिल कर ली और अपने लिए एक नया नाम पाया, जिसे अमूमन ‘पापा’ के नाम से जाना जाता है।
एक मनुष्य के रूप में हमारे दूसरे विकासों के विपरीत, माता-पिता बनना अचानक तीव्रता के साथ होता है। केवल देशकाल के परिप्रेक्ष्य के साथ ही मैं जीवन के रियर-व्यू मिरर में इस वास्तविकता को और अधिक स्पष्ट रूप से देख पाया हूं। और मैंने इस नए संतुलन के साथ तालमेल बिठाना शुरू कर दिया कि परिवार के साथ हमारा संबंध सबसे अधिक तब गहरा होता है, जब उसे नई जिम्मेदारियों की चुनौती दी जाती है और वे जिम्मेदारियां हमें खुद को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूर करती हैं।
फंडा यह है कि जीवन वास्तव में तब हमारे सामने स्वयं को उद्घाटित करता है जब हम माता-पिता के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को सीखने की प्रक्रिया में होते हैं।








