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देशभर में इन दिनों गर्मी चल रही है…
और नाटक भी। गर्मी इसलिए कि ज्यादातर राज्यों में तापमान चालीस डिग्री से ऊपर है। कूलर सारे मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। कही-कहीं एसी भी हांफ रहे हैं।
सूरज सातवें आसमान पर है। शाम छह बजे बाद तक पारा 39 डिग्री के लगभग रहता है। सड़कें लगभग सूनी और हवा तवे से ज्यादा गरम। सुबह-सुबह लगता है, जैसे दिन की शुरुआत सीधे दोपहर से ही हुई है। दोपहर का तो मुंह तक देखने का धरम नहीं रहा। शाम भी सुहानी नहीं रही। क्योंकि तेज धूप, गर्मी के चलते वो गोधूलि वेला, वो पक्षियों का कलरव, वो आधे डूबे सूरज की लालिमा अब शाम के चेहरे से गायब हो चुकी है।
भर शाम को भी धूप चांटा मारने दौड़ती है। ज्यादा चांटे खा लो तो दूसरे दिन लू अपनी चपेट में ले लेती है। फिर भटको डॉक्टर दर डॉक्टर! एन्टीबायोटिक की गर्मी फिर अलग से झेलते फिरो! जहां तक नाटक का सवाल है, इसे करने के लिए नेताओं, मंत्रियों में होड़ मची है।
प्रधानमंत्री ने जब से मितव्ययिता बरतने की अपील की, नेता सारे बढ़-चढ़कर दिखावा करने में जुटे हुए हैं। दिखावा इसलिए कि कोई साइकिल से जा रहा है, कोई मोटरसाइकिल से। लेकिन पीछे कारों के काफिले में कोई कमी नहीं है। फोटो या सेल्फी लेते वक्त उस कारों के काफिले को छिपा लिया जाता है। तेल के भाव चार बार बढ़ चुके हैं लेकिन इन नेताओं, मंत्रियों ने अपने लम्बे काफिले का मोह अब तक नहीं छोड़ा।
जहां तक आम आदमी का सवाल है, उसने अपनी दिनचर्या ही ऐसी कर ली है कि कार या दुपहिया के बिना उसका काम नहीं चलता। घर के पास चार दुकान छोड़कर सब्जी या किराना सामान लेने जाना हो तो भी कार के बिना काम नहीं चलता।
बिना कार सब बेकार हुए जा रहे हैं। किसान भी अपने खेतों में अब मोटरसाइकिल से जा रहा है। आखिर वो पीछे क्यों रहे?
साइकिल की तो अब कहीं गुंजाइश ही नहीं रही। ऐसे में ये मंत्री साइकिल से जाने का दिखावा क्यों कर रहे हैं, समझ में नहीं आता। कम से कम व्यावहारिकता तो रखिए। प्रैक्टिकल रहिए। आप मंत्री हैं, एक कार से जाइए।
बड़ी शान से कह रहे हैं, हमने ईवी ले ली है। आपके पास तो कार बदलने के लिए पैसा है। जिस आम आदमी को दिखाना चाहते हैं, उसके पास तुरंत कार बदलकर ईवी लेने का पैसा है क्या? 140 करोड़ के जिस देश में 80 करोड़ लोगों को आप मुफ्त का अनाज बांट रहे हैं, वहां ईवी कितने लोग खरीद सकते हैं भला?
जहां तक तेल के संकट का सवाल है, दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। और बढ़ेगा। कुछ दिन पहले गुजरात से खबर आई थी कि वहां सारे पेट्रोल पम्पों में सूखा पड़ गया है। अब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में भी पेट्रोल-डीजल की मारामारी चल रही है। किसी को चाही गई मात्रा में तेल नहीं मिल रहा है तो किसी को मिल ही नहीं पा रहा। लेकिन वाहनों की दौड़ में कोई कमी नहीं है। भीड़ वैसी की वैसी है। ट्रैफिक जाम जैसा का तैसा है। इस तरफ कोई ध्यान देना नहीं चाहता!
दरअसल, संसाधनों की बाढ़ इस तरह आ चुकी है कि उससे बाहर आने का रास्ता किसी को सूझ नहीं रहा। या कह सकते हैं कि व्यक्ति खुद भी इन संसाधनों के उपयोग/दुरुपयोग से निकलना नहीं चाहता। भौतिक साधनों, संसाधनों की लत ही कुछ ऐसी होती है! करें तो क्या करें?
कोई ये समझने को तैयार नहीं है कि बात कीमत की नहीं है, उपलब्धता की है! सप्लाई की है!
ऊपर से ये होर्मुज वाले भाई लोग मानने को राजी नहीं हैं। एक नरम पड़ता है तो दूसरा तमतमा जाता है। दूसरा झुकता है तो पहला आंख दिखाने लग जाता है। ऊपर से वो इजराइल वाले नेतन्याहू दोनों तरफ से, दोनों हाथों से आग में घी डालते रहते हैं।
जहां तक ईरान और अमेरिका का सवाल है, उन्हें इससे कोई तकलीफ नहीं है। पूरी दुनिया को वे अपना तेल ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं। तेल बहता जा रहा है। कमाई बढ़ती जा रही है। दुनिया के हाहाकार से उन्हें कोई मतलब नहीं है। पहले भी नहीं रहा। अब भी नहीं है।
दोनों के बीच सुलह कराने का ठेकेदार बना घूम रहा पाकिस्तान भी मुंह की खा चुका है।
सुलह अब उसके बूते की भी बात नहीं रही। बात कीमतों की नहीं है…
संसाधनों की बाढ़ इस तरह आ चुकी है कि उससे बाहर आने का रास्ता किसी को सूझ नहीं रहा। व्यक्ति खुद भी इन संसाधनों के उपयोग/दुरुपयोग से निकलना नहीं चाहता। कोई ये समझने को तैयार नहीं है कि बात कीमत की नहीं है, उपलब्धता की है! सप्लाई की है!
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