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गहराई से भीतर देखें तो हमें अपने भीतर कोई न कोई जानवर सक्रिय होता दिख जाएगा। जिसका जानवर जाग जाए और बाहर की गतिविधि पर अपना प्रभाव रख दे तो फिर हम पशु जैसे हो जाते हैं। भारतीय परंपरा ने इसी जानवर को बांधने के लिए रक्षाबंधन का त्योहार बनाया। यह एक धागा हमें नैतिक बनाता है। स्त्री-पुरुष के देह के आकर्षण को सात्विक बनाता है। वापस अपनापन स्थापित करता है। जिसे सुनकर अपने तुरंत लौट आएं, जीभ से अब वो पुकार निकलनी ही बंद हो गई है। क्योंकि हमारा ही अपनापन कहीं खो गया है। इसलिए रक्षाबंधन एक बहुत गहरी फिलॉस्फी है। यदि आप एक माता-पिता की संतान नहीं हैं तो भी पुरुष स्त्री के प्रति और स्त्री पुरुष के प्रति अत्यधिक सात्विक समर्पित भाव रखे, यही राखी है। आप पाएंगे इस दिन हम अचानक अपने भीतर एक शुद्धता महसूस करते हैं। अपने मनुष्य होने पर गौरव होता है। यह जीवन केवल देह नहीं, आत्मा पर टिका है- यह त्योहार एक दिन में यह गहरी अनुभूति करा जाता है।
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