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भारत में हवाई अड्डों, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, शोध संस्थानों और कल्याणकारी योजनाओं के नाम राजनेताओं के नाम पर रखने की लम्बी परम्परा रही है। हालांकि, भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू इसके सख्त विरोधी थे। 11 नवंबर, 1957 को नेहरू ने एक औपचारिक प्रेस वक्तव्य जारी कर लोगों से उनके नाम पर सार्वजनिक संस्थानों के नाम रखने की प्रथा बंद करने की अपील भी की थी। उन्होंने कहा था कि उनके जीवित रहते किसी भी बुनियादी ढांचे का नामकरण उनके नाम पर नहीं किया जाना चाहिए। यहां तक कि उन्होंने कांग्रेस के सदस्यों को निर्देश भी दिया था कि उनके निधन के बाद सार्वजनिक संस्थानों के नाम उनके या किसी नेता के नाम पर रखना उचित नहीं है। लेकिन नेहरू की बात किसी ने नहीं सुनी। उनकी मृत्यु के बाद ही हरियाणा की एक बड़ी सिंचाई परियोजना का नाम जवाहरलाल नेहरू नहर रख दिया गया। 1969 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की स्थापना हुई। आधिकारिक आरटीआई आंकड़ों के अनुसार, आज नेहरू-गांधी परिवार के तीन प्रधानमंत्रियों- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर 450 से अधिक बड़ी योजनाएं, संस्थान, विश्वविद्यालय और बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं नई दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और हैदराबाद का राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा। इनके अलावा, अक्टूबर 1984 में श्रीमती गांधी की हत्या के कुछ ही महीनों बाद संसद के एक अधिनियम के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) की स्थापना की गई थी। नामकरण की यह आदत फिर गैर-नेहरू-गांधी प्रधानमंत्रियों तक भी पहुंच गई। पी.वी. नरसिंह राव के नाम पर तेलंगाना में एक पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय है, साथ ही राज्य में नरसिंह राव एक्सप्रेस-वे भी है। यहां तक कि मनमोहन सिंह भी इस परम्परा से अछूते नहीं रहे। दिसंबर 2024 में उनके निधन के कुछ ही सप्ताह बाद, 6 जनवरी 2025 को हैदराबाद में उनके नाम पर डॉ. मनमोहन सिंह एक्सप्रेस-वे का नामकरण किया गया। ऐसे में शायद यह पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं था कि नोएडा-जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा गया। अलबत्ता इसकी शुरुआत तभी हो गई थी, जब अहमदाबाद में दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी स्टेडियम रखा गया था। यह पहला बड़ा सार्वजनिक बुनियादी ढांचा था, जिसका नाम मोदी ने अपने नाम पर रखने की अनुमति दी थी। इससे पहले वे इस परंपरा के आलोचक रहे थे, खासकर उन योजनाओं और सार्वजनिक संस्थानों के संदर्भ में, जिनके नाम नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों पर रखे गए हैं। प्रधानमंत्री के रूप में अपने शुरुआती वर्षों में मोदी ने मुफ्त राशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के नाम ‘प्रधानमंत्री’ उपसर्ग के साथ रखने पर जोर दिया था और उनमें अपना नाम जोड़ने से इनकार किया था। इसी तरह प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के नाम रखे गए। हालांकि इससे पूर्व अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 25 दिसंबर 2000 को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) शुरू की थी। इसकी तुलना में दूसरे देश अपने दिवंगत या जीवित नेताओं का सम्मान कैसे करते हैं? ब्रिटेन की नीति तो इस मामले में बिलकुल स्पष्ट है : वहां सार्वजनिक संस्थानों या बुनियादी ढांचे का नाम राजनीतिक नेताओं के नाम पर हरगिज नहीं रखा जाता। इसीलिए लंदन के प्रमुख हवाई अड्डे हीथ्रो का नाम चर्चिल के नाम पर नहीं, बल्कि उस हरे-भरे इलाके के नाम पर रखा गया है, जहां वह स्थित है। पूर्व प्रधानमंत्रियों मार्गरेट थैचर, टोनी ब्लेयर और बोरिस जॉनसन के नाम पर भी कोई सार्वजनिक स्मारक नहीं हैं। यहां तक कि ग्लैडस्टन, बाल्फोर और एटली जैसी ऐतिहासिक हस्तियों के नाम पर भी ऐसे कोई स्मारक वहां मौजूद नहीं हैं। विश्व-प्रसिद्ध ब्रिटिश विश्वविद्यालयों और शोध केंद्रों के नाम भौगोलिक स्थलों पर रखे जाते हैं, किसी नेता के नाम पर नहीं। अमेरिका में जरूर न्यूयॉर्क का जेएफके और वॉशिंगटन का जॉन डलेस हवाई अड्डा प्रमुख नेताओं के नाम पर हैं। जॉन एफ. केनेडी सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स का नाम भी अमेरिका के पहले कैथोलिक राष्ट्रपति के नाम पर रखा गया है। अभी तक अमेरिका में यह प्रवृत्ति सीमित स्तर पर ही रही थी। अलबत्ता ट्रम्प ने अब नामकरण की इस परम्परा को एक प्रहसन के स्तर तक पहुंचा दिया है। वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक हवाई अड्डों, पुस्तकालयों और सार्वजनिक संस्थानों के नाम उनके नाम पर रखे जाएं। इस मामले में वे भारत में नेताओं के जीवित रहते ही उनके नाम पर संस्थानों का नामकरण करने की प्रवृत्ति से मिलते-जुलते हैं, जैसा कि इंदिरा गांधी के मामले में हुआ था। नेहरू इस परंपरा के एक सम्माननीय अपवाद थे। वैसे, राजीव गांधी भी नेहरू की तरह अपने नाम पर संस्थानों का नाम रखे जाने के विरोधी थे। लेकिन उनकी हत्या के बाद कांग्रेस के सदस्यों ने एक नया रिकॉर्ड बना दिया। आरटीआई के आंकड़ों के अनुसार, आज राजीव गांधी के नाम पर केंद्र सरकार की 12 योजनाएं, राज्य स्तर की 52 योजनाएं, 98 विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान, छह हवाई अड्डे और बंदरगाह, 39 अस्पताल, 74 सड़कें और इमारतें तथा 15 राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य हैं- इनमें से अधिकांश का नामकरण उनके निधन के बाद किया गया। देखें तो मोदी के नाम पर अभी केवल एक क्रिकेट स्टेडियम और एक हवाई अड्डा ही है। लेकिन क्या यह यहीं तक सीमित रहेगा? भारतीय समाज में व्यक्ति-पूजा की एक संस्कृति रही है। लोगों का अटेंशन-स्पान घटा है। सोशल मीडिया ने जेन-जी की एक उपसंस्कृति को जन्म दिया है। आज 18 वर्ष की उम्र के कई युवा तब पैदा भी नहीं हुए थे, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। इस आयु वर्ग से इंस्टाग्राम के जरिये जुड़ने की मोदी की कोशिशें अब भी जारी हैं। उधर उत्तर प्रदेश में भी जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ऐसे में नोएडा-जेवर हवाई अड्डे का नाम प्रधानमंत्री के नाम पर रखना एक ऐसी युक्ति भी हो सकती है, जिससे मोदी-योगी की ‘डबल इंजन’ सरकार को चुनावी लाभ मिले! पं. नेहरू की नहीं सुनी गई…
1957 में पं. नेहरू ने एक औपचारिक प्रेस वक्तव्य जारी कर लोगों से उनके नाम पर सार्वजनिक संस्थानों के नाम रखने की प्रथा बंद करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि उनके जीवित रहते किसी भी बुनियादी ढांचे का नामकरण उनके नाम पर नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं सुनी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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